जोधपुर. भले ही विश्व में अग्रेजी भाषा को वर्तमान समय में अधिक महत्व दिया जाता हो, लेकिन हमारी मातृभाषा का कोई मोल नहीं है। इस भाषा में बोलने पर जो अपनत्व का अहसास होता है वो और किसी भाषा में बोलने से नहीं हो सकता है। इसलिए हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हम सबको जोर-शोर से प्रयास करना चाहिए। यह बात जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के नया परिसर में पढऩे वाले हिंदी विभाग के छात्रों ने पत्रिका प्लस के साथ चर्चा में कही। चर्चा में एमए हिंदी विभाग की छात्रा निकिता पंवार, प्रदीप सिंह चौहान, गजेंद्र वैष्णव, रोहित श्रीवास्तव, करिश्मा, खुशबु कन्नेजिया, लक्ष्मी, गायत्री आदि ने हिस्सा लिया।
हिंदी पढऩे वालों के साथ होता है भेदभाव
छात्रों का कहना था कि वर्तमान में इंग्लिस बोलना एक फैशन सा बन गया है। लोग इंग्लिस में पढऩा, बोलने को शान समझते हैं। यदि कोई हिंदी की पढ़ाई करने वाला इन सबके बीच जाता है तो उसे भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि हमारे देश के पीएम नरेंद्र मोदी सिर्फ देश ही नहीं विदेशों में जाकर हिंदी में भाषण दे सकते हैं तो हम क्यों नहीं। इसलिए हिंदी बोलने में हमें गर्व होना चाहिए। यदि हम ही अपनी मातृभाषा को सम्मान नहीं देंगे तो औरों से अपेक्षा रखना बेमानी है। छात्रों का कहना था कि वर्तमान में नई पीढ़ी के बच्चों को हिंदी की पढ़ाई कम करवाई जाती है। बच्चों को शुरु से हिंदी में अध्ययन करवाएंगे तो वो ज्यादा बेहतर जुड़ पाएंगे।
आज ही के दिन मिली थी मान्यता
गौरतलब है कि आज ही के दिन 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
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