जोधपुर. शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) की सोमवार को हुई शोध परामर्शी समूह की बैठक में वन विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एम एल मीणा ने कहा कि शोध कार्य तभी उपयोगी होंगे, जब वह लैब से लैंड तक पहुंचेंगे और आम आदमी तक अपनी पहुंच बना पाएंगे। मीणा ने केर और अन्य आर्थिक रूप से उपयोगी पादपों पर शोध कार्य करने के साथ ग्रामीण इलाकों व शुष्क क्षेत्र की पारिस्थितिकी के अनुरूप प्रोजेक्ट बनाने की सलाह दी।
आफरी निदेशक एमआर बालोच ने शोध परामर्शी समूह की कार्यप्रणाली के बारे में बताया। बालोच स्थानीय शोध परिषद और ऑल इंडिया कॉ-ऑर्डिनेटर प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ नरपत सिंह शेखावत ने विभिन्न स्थानीय प्रजातियों मसलन धोक, केर आदि पर अधिकाधिक शोध कार्य करने और विभिन्न प्रजातियों की अंकुरण क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।
आफरी के समूह समन्वयक डॉ इंद्र देव आर्य ने शोध कार्यों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। काजरी के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ जेसी तिवारी, वन सर्वेक्षण विभाग के डॉ. मैना, जेएनवीयू वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ पवन कसेरा, डॉ सुनीता कच्छावा, कृषि अनुसंधान केंद्र मंडोर के डॉ ईश्वर सिंह, काजरी के डॉ प्रवीण कुमार ने विभिन्न शोध प्रोजेक्ट पर अपने सुझाव दिए। बैठक में 6 नए प्रोजेक्ट की प्रस्तुति की गई। इसमें शुष्क क्षेत्र में कृषि आधारित मधुमक्खी पालन आजीविका पर डॉ शिवानी भटनागर, पश्चिमी राजस्थान में विभिन्न जीवों का जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष में प्रभाव पर डॉ सीमा कुमार, विलायती बबूल के साथ वानस्पतिक विविधता एवं वन भूमि में कार्बन स्टॉक पर डॉ शेराराम, पश्चिमी राजस्थान में विभिन्न घास प्रजातियों के द्वारा कार्बन पृथ्कीकरण पर डॉ भावना शर्मा, डॉ महेश्वर हेगड़े ने केर की जीवितता दर में वृद्धि तथा उनकी फील्ड में स्थिति पर ने प्रोजेक्ट प्रस्तुत किया।
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