आओ दिखाते हैं अनडिस्कवर्ड जोधपुर

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जोधपुर। जोधपुर की अपणायत के बीच यहां के पर्यटक स्थलों का क्रेज भी कम नहीं है। सनसिटी की शान मेहरानगढ़, उम्मेद भवन, मंडोर, जसवंत थड़ा... देखने यहां प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। पर, कुछ अधूरापन अभी भी है। बांहे फैलाकर यहां के अन्य ऐतिहासिक-धार्मिक स्थल पर्यटकों का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उनके बारे में अधिकांश को जानकारी भी नहीं है और ना ही कभी पर्यटन विभाग ने इस तरफ कोई पहल की है। अगर पर्यटन विभाग के साथ ही प्रशासन व जनप्रतिनिधि कड़ी से कड़ी मिलाकर ध्यान दें और पहल करें तो वह दिन दूर नहीं जब यहां के अन्य स्थलों पर भी पर्यटकों की लाइन लगनी शुरू होगी। ऐसे स्थलों की तस्वीर भी बदलते देर नहीं लगेगी। जाहिर है कि पर्यटन बढ़ेगा तो साथ ही साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। विश्व पर्यटन दिवस से एक दिन पूर्व पत्रिका टीम उन स्थलों से रू-ब-रू करवा रही है, जो पर्यटन के हिसाब से अभी तक पर्दे के पीछे ही हैं।
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1. दईजर की रहस्यमय गुफाएं : मंडोर क्षेत्र के दईजर स्थित प्राकृतिक गुफाएं आज भी मानवीय मस्तिष्क और विज्ञान के लिए अनसुलझी है। दईजर की पहाडि़यों में गुफाओं की भूलभुलैया की प्रसिद्धि की चर्चा तो दुनिया भर में है लेकिन पर्यटकों के लिए ये अभी तक अनदेखी दुनिया है। गुफाओं के ऊपर चामुंडा माता का मंदिर प्रमुख आस्था का केंद्र है। दईजर पिकनिक स्पॉट के तौर पर तो जाना जाने लगा है लेकिन गुफाओं को लेकर लोग अनिभिज्ञ हैं।
2. पांच मंजिला तापी बावड़ी: शहर में भीमजी का मोहल्ला में निर्मित तापी बावड़ी कला का अनूठा प्रदर्शन है। बावड़ी के अंदर कलात्मक पोल हैं। महाराजा जसवंत सिंह के समय वर्ष 1671 में इसकी खुदाई शुरू हुई, जो वर्ष १६७५ तक चली। उस समय इस पांच मंजिला बावड़ी बनाने में ७२ हजार रुपए खर्च हुए थे। यह करीब ६० फीट गहरी और २०० फीट चौड़ी है। इसका निर्माण नाथाजी व्यास ने अपने पिता तापोजी व्यास की स्मृति में करवाया था। जल संग्रहण के साथ ही कलात्मकता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?
3. कभी अजूबा था शिप हाउस: शिप हाउस का निर्माण सर प्रताप ने १८८६ में करवाया था। नागौरीगेट के बाहर पहाड़ी पर निर्मित भवन एक शिप के आकार का होने से इसे शिप हाउस कहा जाता है। तीन मंजिला भवन शहर के लिए अजूबा था, ऐसा लगता है कि यहां पानी के जहाज की प्रतिकृति जैसे पहाड़ पर बिठा दी गई है। सर प्रताप शासक वर्ग के एेसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पानी के जहाज से सबसे ज्यादा विदेश यात्राएं की थी। सर प्रताप ने एेसे ही जहाज के आकर का आवास बनाना चाहा, जिसे जीजे ओवरीन और इंजीनियर होम ने आकार प्रदान किया। शिप हाउस में वर्ष १९४९ में प्रथम आकाशवाणी का ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन बनाया गया।
4. पुष्यनक्षत्र की हवेली: स्थापत्य कला का नायाब नमूना है यह हवेली। चांदपोल के पास फुलेराव की घाटी स्थित पुष्यनक्षत्र हवेली का निर्माण कार्य १८९० में पुष्यनक्षत्र के दिन प्रारंभ होकर १९११ तक सिर्फ पुष्यनक्षत्र के दिन ही किया गया है। विदेशों में ख्याति प्राप्त कर चुकी जोधपुर की अनूठी हवेली के निर्माण की योजना इस प्रकार बनाई गई कि हवेली के लिए आवश्यक पत्थरों की तुड़ाई एवं घड़ाई तो पूरे वर्ष चलती रहे लेकिन चिणाई केवल पुष्य नक्षत्र के दिन ही हो। हवेली के निर्माण में २१ साल के दौरान केवल २७३ दिन ही चिणाई करवाई गई। परोपिट दीवार के बीचों बीच इंग्लैण्ड के सम्राट एडवर्ड सप्तम की प्रतिमा भी स्थापित है।
5. सूरसागर महल में मुगल स्थापत्य कला की झलक: जोधपुर के प्राचीन स्थापत्य स्मारकों में एक सूरसागर महल को महाराजा सूरसिंह ने सन १६०६ में बनवाया था। सूरसागर तालाब के पठ्ठे के उपर खूबसूरत मुगल स्थापत्य शैली में महलों का निर्माण करवाया था। पूर्व दिशा में १६७० में महाराजा गजसिंह प्रथम ने महल बनवाया था। चारों दीवारों की तरफ बीच बीच में चार महल बने थे। दक्षिणी महल में संगमरमर का कार्य किया गया। वर्तमान में महल का जीर्णोद्धार करवाया जा रहा है।
6. हींगोला अहाड़ा की छतरी: करीब १२ साल मारवाड़ में भटकने के बाद राव जोधा ने जब सन १४५३ में आक्रमण कर मंडोर पर अधिकार किया तब मेवाड़ की सेना के सेनापति हींगोला अहाड़ा ने राव जोधा के साथ वीरतापूर्वक युद्ध किया। हींगोला की वीरता से प्रभावित होकर राव जोधा ने उनकी याद में बालसमंद में छतरी बनवाई जो आज भी विद्यमान है। इसकी कला देखने लायक है।
7. इन्द्रराज सिंघवी की हवेली: सिंहपोल के पास पचेटिया हिल्स की तलहटी में निर्मित कलात्मक हवेली महाराजा भीमसिंह के राज्यकाल १७९३-१८०३ में बनाई गई। हवेली का निर्माण जोधपुर के तत्कालीन दीवान, युद्ध और राजनीतिक के कुशल प्रशासक इन्द्रराज सिंघवी ने करवाया था। जोधपुर के हेरिटज पाथ में इस हवेली को शामिल किया गया है।
8. महाभारतकालीन भीम की गुफा : मेहरानगढ़ की तलहटी में पचेटिया हिल्स पर ज्वालामुखी माता मंदिर के बाहर पांडव पुत्र भीम की विशाल प्रतिमा मौजूद है। भीम की गुफा महाभारतकालीन मानी जाती है। जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के प्रमुख सिकदार शोभावत भगवानदास की ओर से 35८ साल पहले सन 1661 में भीम की मूर्ति बनवाने का उल्लेख मिलता है। प्रतिमा के पास प्राकृतिक जल प्रवाह है जिसमें पानी की अनवरत आवक है।
9. सुखदेवजी का कलात्मक झालरा: महाराजा अजीतसिंह के शासनकाल में विद्याशाला-किला रोड पर स्थित सुखदेव तिवाड़ी की ओर से जनहितार्थ निर्मित कलात्मक झालरा वर्ष 1828 में 50 गुणा 50 क्षेत्रफल में निर्मित किया गया। झालरे के चारों तरफ कलात्मक पत्थर लगे है। तीन तरफ से नीचे उतरने के लिए कलात्मक सीढिय़ा और बरामदा भी है। देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए दर्शनीय बनाकर जोधपुर के प्राचीन जल संस्कृति से रूबरू करवाया जा सकता है।
10. तखतगढ़ माचिया किला: कायलाना झील के पास माचिया वनखंड की सुरम्य पहाड़ी पर जंगे आजादी के जुड़ा महत्वपूर्ण स्मारक माचिया किला है। जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह ने जंगली सुअरों के शिकार के लिए बनवाया था। कभी राजा महाराजाओं का एेशगाह रहे माचिया किले में दिसम्बर १९४२ से अगस्त १९४३ तक करीब ८ माह तक ३१ स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद रखा गया था। वर्तमान में यहां वनविभाग की ओर से अंदर जाने की इजाजत नहीं है।



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