अमित दवे/जोधपुर. जोधपुरी छीतर पत्थर दुनियाभर में अपनी कलात्मक कारीगरी के लिए विशेष पहचान बना चुका है। खदानों से निकलने के बाद छीतर के पत्थर की कटिंग की जाती है और करोड़ों का व्यवयास किया जा रहा है। लेकिन पत्थर की कटाई से निकलने वाले वेस्ट (स्लरी) के लिए चिन्हित स्थान नहीं होने से इसे खुले में डाला जा रहा है और स्लरी के बड़े-बड़े पहाड़ बन गए है।
एक अनुमान के मुताबिक शहर में प्रतिदिन स्टोन कटिंग से करीब 30 हजार टन स्लरी निकलती है, जो पर्यावरण व जनजीवन को नुकसान पहुंचा सकती है। राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से औद्योगिक इकाइयों को स्थापित करने और संचालित करने की सहमति जारी करने के लिए गाइडलाइन निर्धारित हैं। लेकिन मण्डल के अधिकारी गाइडलाइन को दरकिनार कर सहमति जारी कर रहे हैं।
गाइडलाइन की शर्ते
- जमीन आवंटन पत्र, भू-रूपांतरण पत्र।
- इकाई स्थापित करने की सहमति के लिए वाटर एक्ट 1974 व एयर एक्ट 1981 के तहत निर्धारित प्रारूप में निर्धारित शुल्क सहित आवेदन पत्र।
- प्रदूषण नियंत्रण मापदंडों, जल निकासी, अलग-अलग कार्यो के लिए जल उपभोग, प्रदूषित जल के उपचारित करने का स्रोत का विवरण।
- स्टोन कटिंग से निकलने वाली स्लरी के निस्तारण की मात्रा, इसके पुन उपयोग व निस्तारण की व्यवस्था।
- स्टोन कटिंग व स्लरी के पुन उपयोग का एक्शन प्लान एवं इकाई से उत्पादन क्षमता का जिला उद्योग केन्द्र से स्वीकृति प्रमाण पत्र।
मामला लोकायुक्त में
शिकायतकर्ता महेन्द्र बोहरा ने लोकायुक्त में शिकायत की कि शहर में स्टोन कटिंग इकाइयों की स्लरी के लिए चिन्हित क्षेत्र नहीं है। स्लरी व वेस्ट खुले स्थानों पर डाला जा रहा है। इससे पर्यावरण, भूजल व जनजीवन को भारी नुकसान हो रहा है। इसके अलावा, जिन कटिंग इकाइयों को स्वीकृति जारी की गई, उनके पास भू-रूपांतरण, भू-आवंटन पत्र नहीं है। वर्तमान में लोकायुक्त का पद रिक्त होने से मामले की सुनवाई अटक गई है।
एक नजर में स्टोन कटिंग उद्योग
कितना पुराना उद्योग - करीब 25 साल पुराना
इकाइयां जिले में- 2000-2500
इकाइयां जोधपुर में - 1500-2000
प्रतिदिन कटिंग पत्थर - 1 लाख टन
प्रतिदिन स्लरी - 30 हजार टन
एक दूसरे पर जिम्मेदारी थोप रहे अधिकारी
स्टोन कटिंग के लिए जगह चिन्हित करना हमारे विभाग का काम नहीं है। यह खान विभाग तय करता है।
जगदीशसिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जोधपुर
स्टोन कटिंग की स्लरी के लिए जगह चिन्हित करने का काम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व उद्योग विभाग का है। माइनिंग से निकलने वाले मलबे के लिए खान विभाग जगह चिन्हित करता है।
श्रीकृष्ण शर्मा, माइनिंग इंजीनियर, जोधपुर
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