मेहरानगढ़ दुखांतिका : सरकार ने कहा सार्वजनिक नहीं होगी चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट, हाईकोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में पेश करने को कहा

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जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ( Rajasthan High Court ) ने मेहरानगढ़ दुखांतिका ( mehrangarh stampede ) की जांच के लिए गठित जस्टिस जसराज चौपड़ा आयोग ( justice jasraj chopra ) की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश करने के निर्देश दिए हैं। राज्य कैबिनेट ( Ashok Gehlot government ) ने सोमवार को कानून व्यवस्था प्रभावित होने का अंदेशा जताते हुए आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर नहीं रखने का निर्णय लिया था।

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मुख्य न्यायाधीश ( chief justice ) एस.रविंद्र भट्ट तथा न्यायाधीश डा.पुष्पेंद्रसिंह भाटी की खंडपीठ में मेहरानगढ़ दुखांतिका संघर्ष समिति के सचिव मानाराम की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान मंगलवार को महाधिवक्ता महेन्द्र सिंह सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि राज्य कैबिनेट ने दो कैबिनेट सब कमेटी की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों के आधार पर आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर नहीं रखने का निर्णय लिया है। इसके किसी भी अंश को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। इस पर खंडपीठ ने आयोग की रिपोर्ट व सब कमेटी की सिफारिश को सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश करने को कहा और अगली सुनवाई 2 सितंबर नियत की।

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दूसरी सब कमेटी ने भी अंदेशा जताया

राज्य सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में गठित कैबिनेट सब कमेटी की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने को कहा। जिस पर कैबिनेट ने मोहर लगा दी। प्रथम सब कमेटी ने यह पाया था कि रिपोर्ट के भाग-2 में वर्णित कुछ तथ्य अनुमानों और मिथकों पर आधारित हैं, जिन्हें यदि सार्वजनिक डोमेन में रखा जाता है, तो इससे जनता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। परिणामस्वरूप कानून और व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है।

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राज्य कैबिनेट ने ये तर्क गिनाए

- चौपड़ा जांच आयोग का गठन एक प्रशासनिक निर्णय था। इस संबंध में न तो विधानसभा में कोई प्रस्ताव पारित हुआ था और न ही मंत्रिमंडल की कोई आज्ञा जारी की गई थी। इसलिए इस आयोग का गठन कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट की धारा 3 (1) के अंतर्गत नहीं माना जा सकता।

- सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के आलोक में महाधिवक्ता ने भी अपनी राय दी है कि किसी भी आदेश में कोई गलत प्रावधान लिख दिया गया हो या लिखने से रह गया हो तो सिर्फ इस वजह से वह आदेश अमान्य नहीं हो जाता, बशर्ते कानून से संबंधित आदेश में वर्णित शक्तियों का प्रयोग करने का प्रावधान हो। कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट की धारा 11 में राज्य सरकार को प्रशासनिक स्तर पर जांच आयोग गठित करने का अधिकार है। चौपड़ा आयोग का गठन भी एक प्रशासनिक निर्णय था। अत: आयोग का गठन भी एक्ट की धारा 11 के तहत होना माना जाए।

- एक्ट की धारा 3(4) के अनुसार केवल धारा 3 (1) के अंतर्गत गठित आयोग के लिए ही यह अनिवार्य है कि उसका प्रतिवेदन एवं की गई कार्यवाही को विधानसभा के पटल पर रखा जाए। चौपड़ा आयोग को इस धारा के तहत गठित होना नहीं माना गया है, लिहाजा इसकी रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जाना आवश्यक नहीं। इसके गठन की अधिसूचना में भी धारा 3(4) का प्रावधान नहीं जोड़ा गया था।

- पूर्व में 14 अप्रैल, 2018 को गठित कैबिनेट सब कमेटी ने माना था कि इस जांच रिपोर्ट में कुछ टिप्पणियां या उद्दरण ऐसे हैं, जिन्हें सार्वजनिक किए जाने से जनमानस पर गंभीर विपरीत असर पड़ेगा तथा कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अत: जनहित में रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना उचित नहीं है।

- मंत्रिमंडल सचिवालय के 22 जुलाई के आदेश से गठित दूसरी कैबिनेट सब कमेटी ने भी पूर्व कमेटी की अभिशंषा से सहमति व्यक्त की है। इसलिए कैबिनेट ने भी चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में नहीं रखने और न ही सार्वजनिक करने का निर्णय लिया है।

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मामले की फैक्ट फाइल

तारीख : 30 सितंबर, 2008
हादसा : मेहरानगढ़ स्थित चामुंडा माता मंदिर में भगदड़
नतीजा : नवरात्र के पहले ही दिन 216 जानें गईं
पड़ताल : तत्कालीन भाजपा सरकार ने अक्टूबर 2008 में जस्टिस चौपड़ा आयोग गठित किया
वजह रिपोर्ट में कैद : आयोग ने त्रासदी की जांच की और 5 मई, 2011 को कांग्रेस शासन के दौरान अपनी रिपोर्ट पेश की
जोखिम से परहेज : पिछले साल राज्य की भाजपा सरकार ने कैबिनेट सब कमेटी गठित की, जिसने रिपोर्ट सार्वजनिक करने के जोखिम बताए और अब कांग्रेस सरकार ने भी पहली सब कमेटी की सिफारिश पर रजामंदी जताई।
रिपोर्ट में आखिर क्या : राज्य में चाहे कोई सरकार रही हो, लेकिन कोई भी चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करना चाहता। सवाल उठना लाजिमी कि रिपोर्ट में ऐसा क्या है, जिस पर हर कोई पर्दा चाहता है।



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