जोधपुर के अरनब की टीम ने बनाया hyperloop pod, 500 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेगा

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गजेंद्रसिंह दहिया/जोधपुर. विश्व के सबसे बड़े और पहले हाइपरलूप कॉम्पिटिशन ‘स्पेस- एक्स हाइपरलूप पोड कॉम्पिटिशन 2019’ के जुलाई में होने वाले फाइनल राउंड के लिए एशिया से एकमात्र टीम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मद्रास का चयन हुआ है। आइआइटी मद्रास के 28 छात्रों की टीम ने हाइपरलूप पॉड का बेहतरीन डिजाइन तैयार किया है जो इसी साल जुलाई में अमरीका के कैलिफोर्निया में स्पेस-एक्स के हेड क्वार्टर में होने वाले फाइनल राउंड में एक मील लंबी वेक्यूम ट्यूब में दौड़ेगा। आइआइटी मद्रास की टीम में जोधपुर निवासी अरनब भद्र भी शामिल है। अरनब के पिता डॉ बीके भद्र यहां इसरो में वैज्ञानिक हैं।

1600 टीम में केवल 20 का चयन

स्पेस-एक्स की ओर से 2015 में यह कॉम्पिटिशन शुरू किया गया। इसके अंतर्गत विश्व के समस्त विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों को हाइपरलूप बनाने की चुनौती दी गई। प्रतियोगिता में विश्व की 1600 टीमों ने भाग लिया। अंतिम राउंड के लिए केवल 20 टीम का चयन किया गया है। इनको अपने द्वारा तैयार हाइपरलूप पॉड को ड्राइव करके बताना है। प्रतियोगिता में चयनित होने वाली आइआइटी मद्रास केवल भारत ही नहीं बल्कि एशिया की एकमात्र टीम है। इसके अलावा अमरीका की 11 टीम, स्विजरलैंड व कनाडा की दो-दो टीम, ब्रिटेन, नीदरलैंड, स्पेन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की एक-एक टीम हिस्सा ले रही है।

चुम्बक की बजाय पहिए पर दौड़ाएंगे हाइपरलूप
अरनब ने बताया कि उनके द्वारा तैयार हाइपरलूप पॉड को चुंबक के बजाय पहियों पर चलाया जाएगा। इसके लिए 4 इलेक्ट्रॉनिक मोटर काम में ली जाएगी। इसकी गति करीब 450 से 500 किलोमीटर प्रति घंटा रहने की उम्मीद है। पॉड को तैयार करने में 1.2 करोड़ का खर्चा आया।

वर्तमान में दुनिया में नहीं है हाइपरलूप

वर्तमान में दुनिया में हाइपरलूप तकनीक पर प्रयोग किए जा रहे हैं। विश्व का पहला हाइपरलूप संभवत: 2021 में धरातल पर आ जाएगा। भारत में पुणे और मुंबई के बीच हाइपरलूप ट्रेक तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा और अमरावती के बीच भी इसकी संभावना है।

क्या है हाइपरलूप
हाइपरलूप एक कम दबाव की ट्यूब होती है। इसमें पूरी हवा निकाल दी जाती हैं। इसे निर्वात नलिका भी कहते हैं। नलिका में हाइपरलूप पॉड चलाया जाता है। हवा का घर्षण नहीं होने से पॉड की गति 1000 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच जाती है। यह ट्रांसपोर्ट के सामान्य साधन कार व ट्रेन से सस्ता और प्रदूषण रहित तकनीक है। सामान्यत: इसमें पहियों की जगह मैग्नेटिक लैविटेशन का उपयोग किया जाता है।



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