जोधपुर. हिन्दी साहित्य के शलाका पुरुष, माक्र्सवादी विचारक, शोधकार और प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ. नामवरसिंह के साथ जोधपुर का गहरा रिश्ता रहा है। यह बात वे शिद्दत से महसूस भी करते थे और खुद कहते भी थे। जोधपुर में होने वाले सेमिनारों और यूनिवर्सिटी के पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में भी जरूर आते थे। उन्होंने पत्रकार प्रभाष जोशी के साथ जोधपुर के डॉ.़मदन डागा भवन का उद्घाटन समारोह में भी शिरकत की थी। प्रभाष जोशी ने देश के कई शहरों में नामवर के निमित्त नाम से कार्यक्रम करवाए थे, उनमें से एक कार्यक्रम जोधपुर में भी हुआ था। जोधपुर के शीन काफ निजाम, सावित्री डागा, डॉ रमाकांत शर्मा, आईदानसिंह भाटी, डॅा. रामबक्ष और छोटाराम कुम्हार सहित कई साहित्यकार इसके गवाह हैं। वे प्रो एमजीके मेनन, प्रोफेसर मोहनस्वरूप माहेश्वरी और डॉ नंदलाल कल्ला की यादों में भी बसे रहे। जोधपुर फिल्म सोसाइटी की भी उनके साथ यादें वाबस्ता रहीं।
जोधपुर में हिन्दी विभागाध्यक्ष
जोधपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. वी वी जॉन अपने कार्यकाल के दौरान इस यूनिवर्सिटी में देश भर से हर विषय के विशेषज्ञ ले कर आए थे, उनमें डॉ.नामवरसिंह भी प्रमुख थे। उनकी विद्वता के कारण प्रो. जॉन ने उन्हें बिना साक्षात्कार लिए इस यूनिवर्सिटी में सीधे प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति दी थी। डॉ. सिंह ने विश्वविद्यालय में सन १९७० से १९७४ तक सेवाएं दीं। नामवरसिंह यहां हिन्दी विभागाध्यक्ष भी रहे। उसके बाद भी उनका जोधपुर के साथ गहरा रिश्ता रहा।जोधपुर में नवाचार और आधा गांवडॉ. नामवरसिंह ने जोधपुर विश्वविद्यालय में रहते हुए हिन्दी के पाठ्यक्रम में नवाचार किया था। उन्होंने इस यूनिवर्सिटी में ही किताबों का प्रकाशन शुरू करवाया था। डॉ. नामवरसिंह ने मशहूर उपन्यासकार राही मासूम रजा का उपन्यास 'आधा गांवÓ विश्वविद्यालय के कोर्स में लगवाया था। जिसका कुछ संगठनों ने विरोध किया था और यह मामला विधानसभा में भी उठा था।
जोधपुर में नामवरसिंह व्याख्यानमाला
जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति प्रो. एल एस राठौड़ ने एक लाख रुपए की एफडी करवा कर डॉ. नामवरसिंह व्याख्यानमाला शुरू की थी। उसमें नामवरसिंह ही मुख्य वक्ता होते थे। यह सिलसिला दो साल चला और फिर बंद हो गया।अंतरराष्ट्रीय मीरा संगोष्ठी जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय और महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश के संयुक्त तत्वावधान में २००१ में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मीरा संगोष्ठी में शिरकत की थी।
नामवरसिंह ने कहा था, जोधपुर का मेरे ऊपर ऋण
डॉ. नामवरसिंह ने सुमन केसरी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था-भले ही जोधपुर विश्वविद्यालय में आधा गांव उपन्यास को कोर्स में लगाने का विरोध हुआ हो और उसका अप्रिय अनुभव रहा हो, लेकिन जोधपुर का मेरे ऊपर ऋण है। क्यों कि जोधपुर ने ही मुझे पहली बार प्रोफेसर बनाया,वह भी बिना साक्षात्कार के। मेरी अनुपिस्थिति में मैं वहां चुना गया था। मुझे ऑफर देने में निर्णायक भूमिका थी विषय विशेषज्ञ के रूप में बुलाए गए शिवमंगलसिंह सुमन की तथा प्रो.़ वी वी जॉन की।
एक पुस्तक जोधपुर को समर्पित करना चाहते थे
डॉ. नामवरसिंह ने जोधपुर में आयोजित एक व्याख्यानमाला में अपनी भावी योजना के बारे में बताया था कि मैं एक पुस्तक लिखना चाहता हूं-'हिन्दी उपन्यास की आत्मकथा' और वह जोधपुर को समर्पित होगी। संभवत: वह व्यस्तता के कारण इस पुस्तक की योजना को मूर्त रूप नहीं दे पाए, लेकिन जोधपुर के लिए उनके मन में कृतज्ञता का भाव था जो, जो कई बार अभिव्यक्त होता था।
-डॉ. ओमप्रकाश टाक, साहित्यकार
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