पश्चिमी राजस्थान में संरक्षित खेती के लिए तकनीकी का प्रचार प्रसार जरूरी
जोधपुर।
भारत और चीन ने लगभग एक साथ संरक्षित कृषि प्रारंभ की थी जो चीन में 3.5 मिलियन हैक्टेयर में फैल चुकी है जबकि भारत में मात्र 0.13 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र में खेती की जा रही है। इसका मुख्य कारण इस तकनिकी का उचित प्रचार-प्रसार एवं उत्तरी भारत के लिए संरचनाओं की आकृति का उचित नहीं होना है। यह बात कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपति डॉ बलराजसिंह ने कही। मण्डोर स्थित कृषि विश्वविद्यालय में चल रही तीन दिवसीय प्रथम राष्ट्रीय सब्जी विज्ञान कांग्रेस में सब्जियों के उत्पादन, गुणवत्ता सुधार व संरक्षण विषयों पर मंथन हुआ। इस दौरान डॉ सिंह ने पश्चिमी राजस्थान में संरक्षित खेती की संभावनाओं पर व्याख्यान देते हुए बताया कि राजस्थान के शुष्क एवं अद्र्ध शुष्क क्षेत्रों में पारिस्थितिकी असंतुलन, पर्यावरणीय आद्र्रता ङ्क्षखचाव, कमजोर मृदा, सिंचाई जल की कमी एवं कीट और विषाणुओं के प्रकोप को देखते हुए इस क्षेत्र में छाया गृह, वाकिंग टनल, प्लास्टिक लो टनल, कीटरोधी गृह, प्लास्टिक मल्च एवं ड्रिंप सिंचाई पद्धति अपनाने की भारी संभावनाएं है। डॉ. ब्रह्मसिंह ने मृदा रहित खेती करने की संभावनाओं पर बताया कि जिन क्षेत्रों में मृदा कृषि योग्य नहीं है वहाँ पर भी इस प्रकार की कृषि संभव है। इससे पूर्व विभिन्न सत्रों में वैज्ञानिकों ने सब्जियों के आनुवांशिक सुधार, नवाचार एवं संकर किस्मों के विकास, सब्जियों के गुणवत्ता विकास में आनुवांशिकता का महत्व, बीज रहित बैंगन उत्पादन, भिंडी में लगने वाले विषाणु के नियंत्रण व मटर की फ सल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किए गए अनुसंधानों के लिए शोध-पत्र पढ़े। अन्य सत्र में टमाटर में पत्ती मोडक विषाणु के नियंत्रण व आरएनएआइ तकनिकी द्वारा सब्जियों में विषाणु नियंत्रण पर शोध-पत्र पढ़े।
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