जोधपुर. पिछले दो दशक में करीब 12 सौ से अधिक अनाथ बालक-बालिकाओं का पुनर्वास कर नया जीवन प्रदान करने नवजीवन संस्थान की जोधपुर में तीन शाखाएं है जिसमें लवकुश बाल विकास केन्द्र में 10 बालक और 13 बालिकाएं है। गायत्री बालिका गृह में 6 से 18 वर्ष तक की 25 बालिकाएं और 18 वर्ष से अधिक 5 है। इनमें जन्म के एक घंटे बाद छोड़ी हुई बच्चियां, प्री मैच्योर बच्चियां, मानसिक विमंदित, शारीरिक अक्षम बालिकाएं भी शामिल है। संस्थान में उन माताओं के बच्चों का लालन-पालन होता है जो न जाने किस मजबूरी में बालक-बालिकाओं को सडक़ों के किनारे, निर्जन स्थल अथवा समाज की मर्यादा के डर से गंदी नालियों में फैंक देती थी। संस्थान उन फेंके हुए निराश्रित 12 सौ से अधिक बच्चों के पुनर्वास के माध्यम से नवजीवन प्रदान कर चुका है। संस्थान संचालक 63 वर्षीय राजेन्द्र परिहार कहते है कि संस्थान की सभी बालिकाओं को पढ़ाई, रोजगारपरक कोर्सेज, व्यवसायिक कोर्सेज के अलावा सामाजिक संस्कारों की भी परिवार की तरह शिक्षा दी जाती है। संस्थान की 18 बालिकाओं का विवाह संपन्न और संस्कारित परिवारों में करवाया जा चुका है। विवाह के बाद भी बालिकाएं संस्थान को अपना पीहर मानती है और विवाहित बेटी की तरह उनकी हर जरूरत का ख्याल रखा जाता है।
केस-1
नवजीवन संस्थान की सदस्य बेटी राखी (काल्पनिक नाम ) आज जीवन हर पल एक नए पायदान पर आगे बढ़ रही है। नवजीवन संस्थान के अनाथ बच्चे ही उसके पीहर का परिवार है। उसके माता पिता नवजीवन संस्थान के संचालक राजेन्द्र परिहार ही है जिन्होने न केवल उसे अच्छे संस्कार दिए बल्कि शिक्षा के साथ खेलकूद गतिविधियों में भी उसका हौसला बढ़ाया। राखी का कहना है कि जिस दिन संघर्ष खत्म उस दिन जीवन खत्म हो जाएगा। इसीलिए जीवन के हर पायदान पर संघर्ष कर आगे बढ़ती रहूंगी। जूड़ो में नेशनल चैम्पियन, डांस में अव्वल, चित्रकला में टॉपर, जिमनास्टिक में शानदार प्रदर्शन करने वाली राखी का विवाह 2017 में एक संपन्न परिवार में हुआ। राखी ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि सीनियर सैकन्डरी प्रथम श्रेणी में पास करने के अलावा स्पोट्र्स में भी कई मेडल जीते है। राखी ने बताया कि जब वह तीन साल की थी तब मुझे संस्थान में लाकर छोड़ दिया था। बचपन से ही पढ़ाई और स्पोट्र्स में भी रूचि रही। जूड़ों में नेशनल प्लेयर रही हूं। मुझे जीवन में कुछ कर दिखाने की चाहत आज भी है। फैशन डिजाइनिंग में फाइनल ईयर है। मेरा लक्ष्य फैशन परिधानों का भव्य शो रूम खोलना है जिसके लिए मुझे मेरे पति, ससुराल पक्ष के अलावा संस्थान के संचालक राजेन्द्र भैया का पूरा मागदर्शन मिल रहा है। राखी ने बताया कि लड़किया किसी से कम नहीं होती है। उन्हें जीवन में आगे बढऩे के लिए प्रोतसाहित करना चाहिए। जीवन में आगे चलकर किसी तरह का अफसोस ना रहे कि काश मैं उस समय यदि वो कर लिया होता तो अच्छा होता।
केस-2
वर्ष 1991 में जब मात्र एक दिन की थी तब सिवांचीगेट-चांदपोल रोड पर किसी शख्स को लावारिस अवस्था में मिली थी। उसे लवकुश संस्थान लाकर सौंपा गया। नामकरण किया गया वानी (काल्पनिक नाम ) । वानी जब तीन साल की हुई तो हॉलीवुड की महिला डायरेक्टर सुजेन लोपेज ने कारा नियमों के तहत उसे गोद लिया और उसे लेकर अमरीका चली गई। गोद लेने वाली मां ने उसे नाम दिया एंजलिना वानी। जब वह कुछ समझने लगी तो मां सुजेन ने ही उसे गोद लेने की कहानी बताई। लालन पोषण के दौरान सुजेन ने वानी को भारतीय संस्कार भी दिए। कैलिफोर्निया में इंटरनेशनल बिजनेस में पीजी करने के बाद वानी एक कंपनी में एकाउंट मैनेजर बन गई। जब 26 साल की हुई तो उसे फिर से जोधपुर आने का मौका मिला तो वह नवजीवन संस्थान पहुंची और संस्थान के संचालक और बच्चों से मिलकर उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसने वादा किया कि वो संस्थान की बालिकाओं के हेल्थ ओर पर्सनालिटी डवलपमेंट में उनकी मदद को हर समय तैयार रहेगी। संस्थान की मदर कमला से भी मिली जिसे उसने गोद में खिलाया था। उसने वो फाइल भी देखी जब उसे सडक़ से उठाकर संस्थान में लाया गया था।
केस-3
उस नन्हीं परी ‘कजरी’ (काल्पनिक नाम ) के हाथों की किस्मत रेखाएं भी नहीं बनी थी लेकिन भाग्य में ट्रेन के पहियों के नीचे कुचल कर मरना नहीं बल्कि सात समंदर पार स्वीडन निवासी एलिन क्रिस्टन एरिसन की ममता और प्यार लिखा था। विधाता की सौगात कही जाने वाली उस नन्हीं परी को जिस किसी अज्ञात मां ने समाज के डर से या आर्थिक परेशानियों के कारण बाड़मेर रेलवे स्टेशन के पास पटरियों के बीच 16 अगस्त 2017 को नवजात को मरने के लिए फेंक दिया था। संयोग वहां से गुजरते हुए एक व्यक्ति ने बच्चे की किलकारी को सुना तो पुलिस को सूचित किया। बाड़मेर पुलिस उसे लेकर जोधपुर के उम्मेद अस्पताल पहुंची । बालिका ‘कजरी’ की हालत में सुधार होने के बाद उसे अनाथ बच्चों को नया जीवन देने वाले नवजीवन संस्थान के संचालक राजेन्द्र परिहार को सुपुर्द कर दिया। स्वीडन निवासी 45 वर्षीय अविवाहित एलिन क्रिस्टन एरिसन ने जब इंटरनेट पर ‘कजरी’ को देखा तो उसे अपनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोद लेने की प्रक्रिया पूरी की। एलिन की वार्षिक आय 38 लाख 14 हजार 119 यूएस डॉलर है जो भारतीय मुद्रा में तब्दील होने पर 70 गुणा अधिक होती है। यह जोधपुर में पहला इंटर कंट्री एडोप्शन का मामला था। भारत सरकार के अधीन सेन्ट्रल एडोप्शन रिसोर्स ऑथीरिटी ‘कारा ’ के माध्यम से इंटर कंट्री एडोप्शन की प्रक्रिया पूरी होती है। इसमें कड़ी जांच और संख्त जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद 32 तरह के डॉक्युमेंट्स सौंपने पर ही बच्चा गोद दिया जाता है।
केस-4
‘बाऊजी ’ ही मां, बाप, भाई, बहन और सखा। उससे भी कहीं बढकऱ । अनाथालय की नवजात आज राजस्थान में अंग्रेजी की लेक्चरार है। नवजीवन संस्थान में छह माह तक लालन पोषण के दौरान ही उसे गोद दे दिया गया। आज वह अपने पैरों पर खड़ी है और समाज को शिक्षा प्रदान कर रही है। पत्रिका से बातचीत में रामेश्वरी (काल्पनिक नाम ) ने कहा कि मैने तो जीवन में नवजीवन के संस्थान भगवानसिंह परिहार बाऊजी को ही ‘भगवान’ की मूरत के रूप में देखा है जिनके पास ज्ञान के साथ धन, दया और सदकर्म भी थे। उन्हीं की प्रेरणा से मैने अंग्रेजी लिट्रेचर में एमए किया और कॉलेज में टॉपर रही। यदि ‘बाऊजी ’ का सहारा नहीं होता तो पता नहीं आज कहां होती। आज भी बाऊजी की सीख समाज को कुछ देने की कोशिश कर रही हूं।
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