जोधपुर. प्रदेश की राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत को उनके राजनीतिक जीवन के पहले विधानसभा चुनाव में बुरी तरह शिकस्त का सामना करना पड़ा था। वर्ष 1977 में सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से गहलोत मेरे खिलाफ खड़े हुए थे। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव था। सीधे कॉलेज से राजनीति में आए गहलोत को उस वक्त कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। यहां तक कि खुद के माली समाज में भी उनकी कोई खास पहचान नहीं थी। मैं भी राजनीति में बिल्कुल नया था। उस समय चुनाव में कोई विशेष खर्चा भी नहीं होता था लेकिन जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता था वह भी भारी लगता था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मेरी और गहलोत दोनों की आर्थिक स्थति उस समय बहुत कमजोर थी। अशोक उस समय भी जादूगरी जानते थे लेकिन उनकी कोई जादूगरी मुझ पर नहीं चली। गहलोत ने तो बाकायदा मेरे खिलाफ हत्यारा और शराबी होने के पम्फलेट छपवाकर सरदारपुरा की जनता में बांटे थे। लेकिन जनता ने गहलोत के झूठ को नकारते हुए मुझ पर भरोसा जताया। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े होने के कारण मेरा सम्पर्क क्षेत्र काफी व्यापक था।
गहलोत का सीएम बनना जोधपुर के लिए अच्छी बात है। राज तो वह है जिसमें जनता को सडक़ों पर एक गड्ढा तक नहीं मिले। आमजन का काम बिना किसी एप्रोच का होना चाहिए। सरदारपुरा विस क्षेत्र में बदहाल सार्वजनिक पार्क, अतिक्रमण, अवैध खनन, वन क्षेत्रों में पहाड़ों का सफाया होना जैसी समस्याएं हैं। क्षेत्र में बालिकाओं के लिए एक भी सरकारी कॉलेज नहीं है। मूल समस्या तो अंडरग्राउण्ड में जल रिसाव की है जिसका प्रमुख कारण पुराने शहर की सीवरेज लाइनें हैं। मैं चाहता हूं कि गहलोत इन समस्याओं पर ध्यान दें। उन्हें इस बार कोई ऐसा काम करना चाहिए जिसे जोधपुर की जनता सदियों तक याद करे।
(वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में गहलोत को शिकस्त देने वाले पूर्व विधायक माधोसिंह कच्छवाह ने जैसा पत्रिका को बताया।)
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