फलोदी (जोधपुर). शीतकालीन प्रवास पर खीचन आई एक कुरजां के रिंगिंग कॉलर लगा हुआ नजर आया है। इस कुरजां के दोनों टांगों पर रिंगिंग कॉलर लगा था। रिंगिंग कॉलर पर 1001 कोड भी अंकित है। इन दिनों यहां 20 हजार कुरजां डेरा डाले हुए है। कुरजां में लगा रिंगिंग कॉलर मंगोलिया में पक्षी वैज्ञानिकों द्वारा लगाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
मंगोलिया, चीन, कजाकिस्तान, साइबेरिया में बर्फबारी के कारण भोजन की उपलब्धता में विकट परिस्थितियां पैदा होने से डेमोसाइल क्रैन (कुरजां) प्रतिवर्ष शीतकालीन प्रवास पर खीचन आती है। यह कुरजां शनिवार सुबह खीचन में राधाकृष्ण मंदिर के पास मैदान में अपने समूह के साथ विचरण कर रही थी तथा यहां फोटोग्राफी कर रहे पक्षी प्रेमियों की नजर इस पक्षी के पैरों पर पड़ी तो दोनों टांगों में रिंगिंग कॉलर नजर आए।
दोनों टांग पर लगा है रिंगिंग कॉलर
पक्षी प्रेमी सेवाराम माली ने बताया कि सुबह मध्यप्रदेश से आए वन्यजीव प्रेमी बालक युवराज व प्रथमेश्वर सिंह पंवार पक्षियों की फोटोग्राफी कर रहे थे। इस दौरान राधाकृष्ण मंदिर के पास मैदान में दिखी एक कुरजां के दोनों टांगों में रिंगिंग कॉलर नजर आया। जिस पर युवराज व प्रथमेश्वर ने कुरजां का फोटो खींचकर उपलब्ध करवाया। इस कुरजां के टांग पर लगे रिंगिंग कॉलर का रंग पीला है। उन्होंने बताया कि आज दोपहर रातड़ी नाडी पर एक कुरजां के टांग में रिंगिंग कॉलर दिखी थी।
यूं होता है रिंगिंग कॉलर से अनुसंधान
पक्षी विशेषज्ञ व वैज्ञानिक प्रवासी पक्षियों के प्रजनन स्थलों से प्रवसन स्थलों पर जाने के प्रवसन मार्ग, ठहराव, प्रवसन स्थलों, मृत्यु के कारणों, पक्षियों को खतरे आदि का अध्ययन करने के लिए पक्षियों की टांग या गले में रिंग लगाते है तथा उस पर संबंधित वैज्ञानिक अपना खास कोड भी अंकित कर देता है। जिससे रिंगिंग कॉलर लगा पक्षी कहीं भी नजर आने पर दूसरे पक्षी विशेषज्ञ उस कोड से संबंधित विशेषज्ञ को सूचना दे देते है। इस प्रकार रिंगिंग कॉलर से यह अनुसंधान की प्रक्रिया चलती है।
शोध संस्थानों से किया जा रहा है सम्पर्क
डॉ. सुमित डूकिया, सह आचार्य वन्यजीव विज्ञान, पर्यावरण प्रबंधन विभाग, गुरु गोबिन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने बताया कि अन्तर्राष्ट्रीय क्रैन फाउण्डेशन के सहयोग से पिछले कई सालों में मंगोलिया, कजाकिस्तान व आस-पास के क्षेत्रों में डेमोसाइल क्रैन (कुरजां) के पांव में रंगीन रिंग और गले में बैंड पहनाकर उनके प्रवसन मार्ग व प्रवास स्थलों पर शोध कार्य किया जा रहा है।
शीतकालीन प्रवास के दौरान हजारों की तादाद में कुरजां पश्चिमी राजस्थान पहुंचती है तथा ग्रीष्म ऋतु में लौट जाती है। उन्होंने बताया कि खीचन में रिगिंग कॉलर लगी मिली कुरजां की जानकारी प्राप्त करने के लिए शोध संस्थान से सम्पर्क किया जा रहा है। संभावना है कि यह रिंगिंग कॉलर मंगोलिया में लगाया गया है तथा इस कुरजां का यहां मिलना मंगोलिया से यहां प्रवास पर आना सत्यापित करता है।
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