गजेंद्र सिंह दहिया/जोधपुर. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) जोधपुर की प्रयोगशाला में कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के द्वारा हाइड्रोजन बनाई गई है। इस हाइड्रोजन को प्राप्त करने में सूर्य के प्रकाश के साथ रासायनिक तत्व लैंथेनाइड का उपयोग किया गया जो बेहद मितव्ययी है। जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोलियम भण्डार के लगातार कम व महंगा होने से हाइड्रोजन का उपयोग वाहनों में स्वच्छ ईंधन के रूप में किया जा सकेगा। वर्तमान में कई कार निर्माता कम्पनियों ने हाइड्रोजन जनित कारें बनाई है, लेकिन उनकी तकनीक व हाइड्रोजन बनाने की विधि महंगी होने से वर्तमान में इनका चलन कम है। आइआइटी की इस तकनीक का औद्योगिक स्तर पर उत्पादन करने के बाद आम लोगों को सस्ता हाइड्रोजन ईंधन मिल सकेगा।
8 साल में बनी हाइड्रोजन
आइआइटी जोधपुर के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. राकेश शर्मा को आठ साल पहले संस्थान में प्रवेश के समय पहला प्रोजेक्ट सस्ती हाइड्रोजन प्राप्त करने की विधि का मिला। डॉ. शर्मा ने लैंथेनाइड बेस्ड प्रिवोस्काइट नैनोकम्पोजि कैटालिस्ट विधि से प्रयोगशाला में कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के द्वारा पानी के अणु को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विखण्डित कर दिया। पानी के एक अणु में हाइड्रोजन का एक और ऑक्सीजन के दो परमाणु होते हैं। लैंथेनाइड तत्व और सौर ऊर्जा के उपयोग से ऑक्सीजन विलयन रूप में रह गई और हाइड्रोजन को अलग कर लिया गया। यह विज्ञान एवं तकनीकी विभाग का प्रोजेक्ट था। वैसे प्राकृतिक प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पौधों में होती है। इसमें पत्तियां जड़ से प्राप्त पानी व सूर्य के प्रकाश की मदद से भोजन का निर्माण करती है।
वर्तमान में हाइड्रोजन महंगी
मैथेन को 1200 से 1300 डिग्री तापमान पर गर्म करने से वह कार्बन व हाइड्रोजन के रूप में अलग-अलग प्राप्त होती है। मैथेन गैस को पेट्रोलियम से प्राप्त करते हैं। वर्तमान में हाइड्रोजन प्राप्त करने की यह एकमात्र विधि है जो बहुत महंगी है। इसकी वजह से हाइड्रोजन का ईंधन के रूप में उपयोग नहीं हो पाता है। सूर्य में भी ऊर्जा का स्रोत हाइड्रोजन ही है। हाइड्रोजन का उत्पादन सस्ता होने से यह दुनिया का बेहतरीन ईंधन होगा क्योंकि पानी की बहुलता के साथ इसमें प्रदूषण शून्य है।
डॉ. राकेश शर्मा, रसायन विज्ञान विभाग, आइआइटी जोधपुर
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