जोधपुर
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एके सीकरी ने कहा कि सेरोगेसी को स्वीकार करना एक चुनौती से कम नहीं है। सरोगेसी को लेकर बिल तो बहुत आए लेकिन यह अभी तक कानून के तौर पर अमल में नहीं आ पाया है।
जस्टिस सीकरी शनिवार को यहां राजस्थान न्यायिक अकादमी के कॉन्फ्रेंस रूम में अधिवक्ता नमन मोहनोत व रिचा विनोदसिंह लिखित पुस्तक ‘सेरोगेसी एंड द लॉ’ पुस्तक व लीगल रोबो डॉट कॉम के विमोचन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे।
उन्होंने माना कि सेरोगेट मदर बनने वाली महिलाओं में ज्यादातर वे हैं जो गरीबी से जूझ रही हैं और पैसों के बदले में सेरोगेट मदर बनने के लिए तैयार हो जाती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नांद्राजोग ने कहा कि जब ब्लड डोनेशन, किडनी डोनेशन, लिवर डोनेशन आदि हो रहे हैं तो फिर सेरोगेसी से परहेज क्यों है।
रिप्रोडक्टिव राइट केवल प्रजनन अधिकार नहीं
जस्टिस सीकरी ने आइएलआइ राजस्थान चैप्टर की ओर से ‘रिप्रोडक्टिव राइट्स’ पर आयोजित सेमीनार को सम्बोधित करते हुए कहा कि प्रजनन संवैधानिक नहीं बल्कि मानवाधिकार है।
एक शादीशुदा जोड़े को यह अधिकार है कि जिम्मेदारी से अपने बच्चों की संख्या व समय तय करे। क्योंकि भारत में आमतौर पर देखा जाता है कि शादी के बाद परिजन का दबाव होता है कि बच्चे को जन्म दें, लेकिन यह तय करना उस जोड़े का अधिकार है कि बच्चा कब होगा।
उन्होंने कहा कि रेप पीडि़ता के गर्भधारण करने पर उस बच्चे को रखने का या ना रखने का अधिकार पीडि़ता का है। क्योंकि प्रजनन का अर्थ यह नहीं कि बच्चे पैदा करें, बल्कि महिला अपने शरीर पर क्या करना चाहे ये उसका अधिकार है। राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंद्राजोग ने कहा कि प्रजनन अधिकार केवल महिला का नही है बल्कि पुरुष का भी अधिकार है।
सेमीनार को जस्टिस संगीत लोढा व जस्टिस संदीप मेहता ने भी सम्बोधित किया। दोनों कार्यक्रम में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस केएस अहलूवालिया, संदीप मेहता, विजय विश्नोई, अरुण भंसाली, दिनेश मेहता, विनीत माथुर, मनोज गर्ग, रजिस्ट्रार प्रशासन, न्यायिक अधिकारी व अधिवक्ता मौजूद रहे।
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