फलोदी (जोधपुर) . सात समन्दर पार कर हजारों किलोमीटर का सफर तय करने के बाद प्रतिवर्ष फलोदी के खीचन गांव में पहुंचने वाले मेहमान पक्षी कुरजां (डेमोसाइल क्रैन) की संख्या में इस बार क्षेत्र में अक्टूबर माह की गर्मी के बावजूद लगातार इजाफा हो रहा है।
हजारों की तादाद में इन पक्षियों की मौजूदगी से गांव में कुरजांमय महसूस हो रहा है। इन दिनों खीचन में करीब 8 हजार पक्षियों का कलरव गूंज रहा है, और पक्षियों की मनमोहक अठखेलियों को निहारने के लिए देशी-विदेशी पर्यटकों का तांता लगना शुरू हो गया है।
इन दिनों फलोदी क्षेत्र का अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस व न्यूनतम तापमान 18 डिग्री सेल्सियस के आस-पास चल रहा है। वहीं दूसरी तरफ कुरजां की अक्टूबर माह में यह संख्या कई सालों में अधिकतम होने की संभावना है। ये पक्षी यहां 6 माह के शीतकालीन प्रवास के बाद मार्च में वतन वापसी की उड़ान भरना शुरू कर देंगे। शीतकालीन प्रवास के दौरान यहां पक्षियों की संख्या करीब 20 हजार से ज्यादा हो जाती है।
अक्टूबर के आंकड़ों में इस बार ज्यादा पक्षी
खीचन के पक्षी प्रेमी सेवाराम माली ने बताया कि इस बार पिछले कई सालों की तुलना में अक्टूबर माह में कुरजां की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। यहां खीचन में कुरजां के पंहुचने का सिलसिला जारी है। इन दिनों खीचन में करीब 8 हजार कुरजां विचरण कर रही है। पिछले वर्षों की बात करें तो अक्टूबर माह के इन दिनों में 2017 में कुरजां की संख्या 5 हजार, 2016 में करीब 8 सौ, 2015 में 4 हजार,2014 में 5 हजार व 2013 में करीब 6 सौ कुरजां पंहुच चुकी थी। हालांकि मौसम अब भी गर्म है, लेकिन कुरजां की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
प्रजनन क्षेत्र के तापमान पर निर्भर करती है संख्या
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊलाल बोहरा का कहना है कि कुरजां के प्रजनन क्षेत्रों में तापमान में गिरावट के साथ ही पक्षी वहां से प्रवसन शुरू कर देते हैं। प्रवसन का मुख्य कारण बारिश व बर्फबारी में भोजन की कमी रहता है। प्रजनन क्षेत्रों में भोजन की कमी के चलते वहां से हजारों पक्षी शीतकालीन प्रवास पर निकल जाते हैं। उनका कहना है कि इन पक्षियों को अपने प्रजनन क्षेत्र में आगामी मौसम का पूर्वाभास हो जाता है और प्रवास पर निकल जाते हैं।
अनुसंधान की तरफ बढ़े कदम
खीचन में हजारों की तादाद में आने वाले डेमोसाइल क्रैन ने यहां पक्षियों पर अनुसंधान की संभावनाएं भी दिखाई है। ऐसे में खीचन में पक्षियों पर अनुसंधान के लिए कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे पक्षियों प्रवसन मार्ग, प्रजनन क्षेत्रों, संरक्षण व खतरों से संबधित जानकारियां उपलब्ध हो सके।
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