यमुनाशंकर सोनी
शहर की एक हैण्डीक्राफ्ट इकाई में गुरुवार देर रात आग लग गई। इस घटना ने एक बार फिर शहर के अनियंत्रित विस्तार, विभिन्न स्तरों पर बरती जा रही लापरवाही और नियमों की पालना कराने में सम्बंधित विभागों की विफलता की तरफ इशारा किया है।
पाल बालाजी के पास पाŸवनाथ नगर स्थित जिस इकाई में आग लगी वहां कई इकाइयां वर्षों से हैं। अन्य औद्योगिक इलाकों की तरह वहां भी धीरे-धीरे आबादी का विस्तार हो रहा है। बताया जा रहा है कि बिजली के पोल में लूज काँटेक्ट के कारण स्पार्किंग से आग लगी। इससे फैक्ट्री में रखा लकड़ी का कच्चा और तैयार माल जलने लगा। मध्यरात में फैक्ट्री में कार्यरत श्रमिक करीब 15 फीट ऊंचे टिनशेड पर सो रहे थे। टिनशेड गर्म होने पर उन्हें नीचे गोदाम में आग लगने का पता चला। कल्पना कर सकते हैं कि आग एकदम विकराल हो जाती तो क्या होता?
जोधपुर की औद्योगिक इकाइयों में आग लगने की हर माह एक दो घटनाएं होना सामान्य बात है। गर्मी के दिनों में इनकी संख्या बढ़ जाती है। ऐसी घटनाओं से हर साल करोड़ों रुपए के तैयार और कच्चे माल का तो नुकसान होता ही है, कई बार लोगों की जान चली जाती है या स्थाई विकलांगता के शिकार हो जाते हैं। श्रमिकों के कार्यदिवसों का भी नुकसान होता है।
औद्योगिक इकाइयों को नगरीय विकास या पर्यावरण विभाग फायर एनओसी प्रदान करता है। यह उद्योग स्थापना की अनिवार्य शुरुआती प्रक्रिया है। एनओसी तभी दी जाती है जब संबंधित औद्योगिक इकाई में आग से बचाव के लिए जरूरी उपकरणों का इंस्टालेशन नियमानुसार किया जाए। फायर एनओसी के लिए किसी भी औद्योगिक इकाई को हाइड्रेन पाइप लाइन, ओवर हेड व भूमिगत पानी के टैंक, हाइप्रेशराइज पानी की मोटर, स्वचलित अलार्म सिस्टम, आग बुझाने में सहायक फोम, जनरेटर और पृथक से विद्युत व्यवस्था करनी होती है ताकि आग लगने पर बिजली बंद होने के बावजूद प्रेशर के साथ पानी की बौछार की जा सके। फैक्ट्री में ज्वलनशील या विस्फोटक पदार्थ हैं तो नियम और कड़े हो जाते हैं। इनका निर्धारित अवधि के बाद नवीनीकरण करवाना जरूरी होता है।
इन नियमों और शर्तों का कितना पालन होता है यह किसी से छिपा नहीं है। यह स्थिति तब है जब जिला कलक्टर नगर निगम, जेडीए और अन्य विभागों को कई मौकों पर औद्योगिक इकाइयों का सर्वे करने के निर्देश देते रहते हैं। रीको के एक अधिकारी ने खुद माना कि स्थिति काफी गंभीर है। कई इकाइयों के पास फायर एनओसी ही नहीं है। हालांकि जिस फैक्ट्री में आग लगी वह रीको क्षेत्र में नहीं थी।
दूसरी समस्या औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय बस्तियों का फैलाव है। कई दशकों से शहर में कोई नया औद्योगिक क्षेत्र विकसित नहीं हुआ। सरकार ने दूरगामी योजना के तहत उद्योगों के लिए जमीन का आरक्षण नहीं किया। दूसरी तरफ औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास की जमीन पर आवासीय या व्यावयायिक गतिविधियां बढऩे लगी।
औद्योगिक क्षेत्रों में कई सिक व अन्य यूनिट्स को भू उपयोग परिवर्तन की अनुमति दे दी जाती है। इस भूमि पर आवासीय परियोजनाएं, होटल, मॉल्स या शोरूम बन जाते हैं। प्रमुख औद्योगिक संगठनों का कहना है कि इंडस्ट्री आवासीय क्षेत्रों में नहीं जा रही, आवासीय क्षेत्र इंडस्ट्रियल एरिया में आ रहे हैं। कारण कुछ भी हों, वक्त का तकाजा है कि स्थानीय या प्रदेश स्तर पर इस समस्या के समाधान के गंभीर प्रयास हों।
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