लुप्त होती परम्पराओं को थामे हैं ये तीज त्योहार,

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लुफ्त होती परम्पराओं को थामे हैं ये तीज त्योहार,अब इनमें भी मिलावट सी होने लगी हैं बस महज औपचारिकतायें ही तो पूर्ण करते हैं हम,अत्याधुनिक जो हो गए हैं,आधुनिकता का चश्मा पहने हम बस परम्पराओं का गला घोंटने में व्यस्त हैं,नहीं समझते कि हम वो नहीं जो होने का दिखावा करते हैं बल्कि हम अंश हैं इस रंग बिरंगे त्योहारों के देश की,इसी क्रम में हमारे हिन्दू पंचाग के कालचक्र में श्रावण, भाद्रपद और कार्तिक मूल माह हैं त्योहार आगमन के,कोई भी संस्कृति और सभ्यता का अक्षुण्ण रहना इस बात पर निर्भर करता हैं कि आपकी भावी पीढ़ी आप द्वारा प्रदत्त धरोहरों और परम्पराओं को किस प्रकार सम्भालते हैं!!
मैं बात करूं मरुधरा की तो यहां पग पग पर आपको शौर्य और बलिदान की गाथाएं मिल जाएगी!आज ही के दिन गौरक्षा करते गोगाजी और उनके सुपुत्र केशरिया कंवर जी ने प्राण न्योछावर कर दिये और उन्हीं की स्मृति में समूचे राजस्थान में भाद्रपद शुक्ल नवमी को मेले भरते हैं,इनके देवरों, मंदिरों में किसी प्रकार का जातीय बन्धन देखने को नहीं मिलता,इनके प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा रखने वाले अपने शरीर पर कोड़े मार इनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं!इजे प्रकार की परम्पराओं का हास् हो रहा हैं कारण युवा वर्ग इस प्रकार की परम्पराओं और इन वीरों(लोकदेवताओं) के बलिदान के महत्व को समझना ही नहीं चाहते!हम सब का दायित्व बनता हैं कि अपनी निजी और व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ क्षण निकाल अपनी संस्कृति और लुप्त होती परम्पराओं को देवें ताकि आने वाली पीढ़ी को ये अनमोल धरोहरें और परम्परायें भेंट कर सकें!!!!

आज़ाद😊
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