‘न्यू जोधपुर’ बनाएं, पहले समस्याएं तो सुलझाएं

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यमुनाशंकर सोनी

जोधपुर शहर का स्थापत्य अनूठा है। दुनियाभर से हर साल लाखों पर्यटक इसे देखने आते हैं और सराहते नहीं थकते। अब जोधपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) ने जोधपुर शहर को इंदौर और रायपुर की तर्ज पर विकसित करने का इरादा जाहिर किया है।

अभी तो मास्टर प्लान तैयार करने वाली कंपनी ने अपना प्रजेंटेशन दिया है। यह जोनल प्लान सन् 2031 को ध्यान में रखते हुए बनाए जा रहे हैं। कहा यह भी गया है कि शहर में पहली बार सेक्टर या जोनल मास्टर प्लान बनाए जा रहे हैं। यह कब तक होगा और इसके लिए जरूरी बजट कहां से आएगा, यह पूछना अभी जल्दबाजी होगी। पर यह सवाल तो किया जा सकता है कि जोधपुर को जोधपुर की तरह ही विकसित क्यों नहीं किया जा सकता।

हमारे शहर की बसावट में क्या कमी है और इंदौर और रायपुर में ऐसी क्या खूबी है जिसे आदर्श मान लिया गया है। अगर दूसरे शहर से ही प्रेरणा लेनी है तो फिर पुणे या बंगलुरु क्यों नहीं? बड़े सपने देखने से ही बड़ा काम हो पाएगा। लेकिन नकल करके तो हम अपने शहर का विकास नहीं कर सकते। वहां की और यहां भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी हों तो ही उधार का कन्सेप्ट अप्लाई किया जा सकता है।


नए मास्टर प्लान लागू करने से पहले क्या यह जरूरी नहीं कि शहर की बेतरतीब बसावट से जो भयावह समस्याएं सामने आ रही हैं, पहले उनका निराकरण किया जाए? वाल सिटी के बाहर विस्फोटक तरीके से बढ़ रहे जोधपुर में पानी का बहाव गंभीर समस्या है। समस्या का कारण यह है कि ऐतिहासिक जलाशयों को पाटकर कॉलोनियां बसा दी गई। उम्मेदसागर इसका उदाहरण है। इसके बाद शहर से बरसात के पानी की निकासी के लिए जो नाले बनाए गए वे कामयाब नहीं हुए।

 

यही वजह है कि हर साल मामूली बरसात से शहर में सैलाब आ जाता है और जान-माल की हानि होती है। हाईकोर्ट की फटकारों के बाद भी इस दिशा में ठोस काम नहीं हुआ। ‘न्यू जोधपुर’ बसाने का इरादा जताते समय जेडीए अध्यक्ष ने भी स्वीकार किया है कि शहर में थीड़ी सी बारिश होते ही जल भराव की स्थिति पैदा हो जाती है। उनका यह भी कहना है कि बारिश के पानी और घरेलू अपशिष्ट की निकासी पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। लेकिन यह भी कहा कि शहर के मास्टर प्लान में ड्रेनेज मास्टर प्लान शामिल नहीं है, नगर निगम इस पर अलग से काम कर रहा है। अब नगर निगम की क्षमता और कार्यप्रणाली को देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले कितने वर्षों में इस समस्या का समाधान हो पाएगा।

 

दूसरी बड़ी समस्या सुगम यातायात को लेकर है। कई जगह एक्सीडेंट जोन बन गए हैं। शहर में बने छह में से पांच ओवरब्रिज डिफेक्टेड हैं। सारणनगर, भदवासिया, बासनी और सालावास ओवरब्रिज नियोजन के नियमों की अनदेखी के बड़े उदाहरण हैं। कहीं डिजाइन सही नहीं थी तो कहीं राजनीतिक फायदे के लिए नक्शे बदल दिए।
एक अन्य मुद्दा ‘ऑक्सीजोन’ का है। मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में कहा गया है कि शहर के प्रत्येक जोन में मण्डोर जैसे गार्डन होंगे। लेकिन मण्डोर गार्डन की दशा किसी से छिपी नहीं है।

 

शहर का समग्र विकास, हेरिटेज संरक्षण केवल सरकार या किसी एक एजेंसी की जिम्मेदारी नहीं है। लेकिन बड़े-बड़े दावे होने लगें तो पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी देखा जाना चाहिए। शहर की कलात्मक बावडिय़ों, गुलाब सागर, ऐतिहासिक दरवाजों और पोûों की हालत सबके सामने हैं। समस्याओं को लाल कालीन के नीचे दबाने से उनका समाधान नहीं हो सकता। बड़ी योजनाएं बनाने से पहले आम जनजीवन से जुड़ी छोटी समस्याओं का निस्तारण करने पर भी ध्यान देना होगा। तभी यह शहर सही मायने में विकसित हो सकेगा।
yamunashankar.soni@epatrika.com

 



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