गजेन्द्र दहिया/जोधपुर. अजमेर, पाली और राजसमंद की सीमा से सटे टाडगढ़ रावली अभयारण्य में उपलब्ध वनस्पति का पहली बार बड़े स्तर पर शोध किया जा रहा है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआइ) टाडगढ़ में मौजूद सभी पेड़-पौधों का संग्रहण कर उनकी मैपिंग कर रहा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जोधपुर स्थित बीएसआइ के शुष्क क्षेत्र प्रादेशिक केंद्र को टाडगढ़ रावली अभयारण्य के वानस्पतिक शोध के लिए प्रोजेक्ट दिया है। इसके तहत वहां मौजूद सभी पेड़-पौधों की पहचान कर उनका वर्गीकरण किया जा रहा है। पौधों की जीन मैपिंग और उनके क्रमागत विकास को भी देखा जा रहा है। कुछ पौधों की क्षमता संवद्र्धन की संभावना भी तलाशी जा रही है। नैनो टेक्नोलॉजी के जरिए आर्थिक महत्व के पौधों से अधिक लाभ मिलने की संभावना है।
यह शोध डॉ. चंदनसिंह को मिला है। टाडगढ़ रावली अभयारण्य अजमेर, पाली और राजसमंद जिलों के मध्य लंबी पट्टीनुमा संरचना के रूप में है। राज्य सरकार ने 1983 में इसे अभयारण्य घोषित किया था। यह 495 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां उपोष्ण पर्णपाती वनस्पति के अतिरिक्त भालू, सियार, पैंथर पाए जाते हैं। राजस्थान का इतिहास लिखने वाले अंग्रेज अधिकारी कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर इसका नाम टाडगढ रावली रखा गया है। अभी तक यहां की वनस्पति पर कुछ छात्रों ने पीएचडी की है लेकिन विस्तृत शोध पहली बार किया जा रहा है।
औषधीय महत्व के पौधे मिले
अभी तक करीब 750 पौधों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से कई पौधे ऐसे हैं जो हिमालय की तलहटी में भी पाए जाते हैं और इनका औषधीय महत्व भी है। इन पौधों को देश के अन्य हिस्सों में ले जाने की सरकार की योजना है।
शोध कार्य चल रहा है
'टाडगढ़ रावली की वनस्पति पर शोध किया जा रहा है। प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम वहां वनस्पति का संग्रहण कर रहे हैं और उसकी पहचान कर रहे हैं। प्रोजेक्ट की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी जाएगी।
डॉ. विनोद मैना, प्रभारी, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण जोधपुर
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