डाँगीयावास: राजकुमार सिंह आजाद
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समय पर मानसून आने हेतु प्रदेश वासियो एवं किसानों को बधाई!
कहने को तो अपना देश कृषि प्रधान देश हैं ज्यादातर आबादी कृषि पर ही निर्भर हैं परन्तु देश का किसान मानसून द्वारा प्रताड़ित किया जाता रहा हैं कभी अतिवृष्टि&ओलावृष्टि तो कभी अनावृष्टि, एक सीमान्त किसान के एक खेत मे जुताई,बुवाई, देखभाल,खाद, कीटनाशी छिड़काव और ना जाने क्या क्या महंगाई के दौर में जितना औसतन खर्च बैठता हैं उतना उत्पादन ही नहीं हो पाता और यदि हो जाये तो बिचौलिये भेडियो के शिकंजे में फंस जाते हैं,सरकार समर्थन मूल्य 53% बढ़ाने का दम्भ भरती हैं पंरतु क्या सरकार प्रत्येक गरीब किसान के अनाज को बिचौलियों की नजर से बचा अपने भंडारों में भंडारण कर उन्हें उनके परिश्रम का इनाम देने को प्रयास भी करती है?यदि ईमानदारी से कहूँ तो जी नहीं,पिछली बार भी अनेक औपचरिकताएँ पूर्ण करने के पश्चात किसान समर्थन मूल्य की देहरी चढ़ सके,जानकारी के अभाव में और जटिल प्रक्रिया और भ्रांतियों को देखते हुए किसान समर्थन मूल्य द्वारा अपने सालभर की जी तोड़ मेहनत के ईनाम को वहां नहीं बेच कम ही सही रोकड़ पैसे में बेच देता हैं जबकि सरकार ने प्रक्रिया को ऑनलाइन कर कुछ हद तक प्रयास भी किये हैं!
बात की जाये किसान को दिए जाने वाले ऋण प्रबन्धन की तो वो भी ऊंट के मुँह में जीरे वाली बात ही साबित होती हैं,इसमें भी संशोधन और नए नियमों से परेशानी होती हैं,सीमान्त और लघु किसानों के लिए ऋण लेना दूर की कौड़ी साबित होता हैं!
अमूमन हम कई बार देखते हैं कि ओलावृष्टि और अनावृष्टि के दौरान जब नुकसान का आकलन होकर सरकार द्वारा मुवावजे के जो चैक किसानों को मिलते हैं वो उनके गाल पर तमाचा मारने जैसे होते हैं,10 रुपये, 40 रुपये के चैक कई ऐसे मुवावजा चैक अखबारों की सुर्खियां बटोरते हैं!
देश मे किसानों के हितों में सख्त और प्रभावी निर्णय लिए जावें स्वामीनाथन रिपोर्ट प्रभावी तरीके से लागू हो!
किसानो को उन्नत किस्म के खाद,बीज सरकार द्वारा दिये जावें और ना केवल वृहत किसानों को बल्कि लघु और सीमान्त किसानों के हितों की रक्षा भी की जावे!!
कहने को तो अपना देश कृषि प्रधान देश हैं ज्यादातर आबादी कृषि पर ही निर्भर हैं परन्तु देश का किसान मानसून द्वारा प्रताड़ित किया जाता रहा हैं कभी अतिवृष्टि&ओलावृष्टि तो कभी अनावृष्टि, एक सीमान्त किसान के एक खेत मे जुताई,बुवाई, देखभाल,खाद, कीटनाशी छिड़काव और ना जाने क्या क्या महंगाई के दौर में जितना औसतन खर्च बैठता हैं उतना उत्पादन ही नहीं हो पाता और यदि हो जाये तो बिचौलिये भेडियो के शिकंजे में फंस जाते हैं,सरकार समर्थन मूल्य 53% बढ़ाने का दम्भ भरती हैं पंरतु क्या सरकार प्रत्येक गरीब किसान के अनाज को बिचौलियों की नजर से बचा अपने भंडारों में भंडारण कर उन्हें उनके परिश्रम का इनाम देने को प्रयास भी करती है?यदि ईमानदारी से कहूँ तो जी नहीं,पिछली बार भी अनेक औपचरिकताएँ पूर्ण करने के पश्चात किसान समर्थन मूल्य की देहरी चढ़ सके,जानकारी के अभाव में और जटिल प्रक्रिया और भ्रांतियों को देखते हुए किसान समर्थन मूल्य द्वारा अपने सालभर की जी तोड़ मेहनत के ईनाम को वहां नहीं बेच कम ही सही रोकड़ पैसे में बेच देता हैं जबकि सरकार ने प्रक्रिया को ऑनलाइन कर कुछ हद तक प्रयास भी किये हैं!
बात की जाये किसान को दिए जाने वाले ऋण प्रबन्धन की तो वो भी ऊंट के मुँह में जीरे वाली बात ही साबित होती हैं,इसमें भी संशोधन और नए नियमों से परेशानी होती हैं,सीमान्त और लघु किसानों के लिए ऋण लेना दूर की कौड़ी साबित होता हैं!
अमूमन हम कई बार देखते हैं कि ओलावृष्टि और अनावृष्टि के दौरान जब नुकसान का आकलन होकर सरकार द्वारा मुवावजे के जो चैक किसानों को मिलते हैं वो उनके गाल पर तमाचा मारने जैसे होते हैं,10 रुपये, 40 रुपये के चैक कई ऐसे मुवावजा चैक अखबारों की सुर्खियां बटोरते हैं!
देश मे किसानों के हितों में सख्त और प्रभावी निर्णय लिए जावें स्वामीनाथन रिपोर्ट प्रभावी तरीके से लागू हो!
किसानो को उन्नत किस्म के खाद,बीज सरकार द्वारा दिये जावें और ना केवल वृहत किसानों को बल्कि लघु और सीमान्त किसानों के हितों की रक्षा भी की जावे!!

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