बेसहारा बालिकाएं कैसे जाएं अस्पताल?

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जोधपुर.मंडोर स्थित बालिका गृह के बच्चे राज्य सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। बालिका गृह में नवजात सहित करीब 50 बालिकाएं आवासनी के रूप में रहती हैं। बीमार होने पर उन्हें मंडोर अस्पताल ले जाते हैंं तो वहां से उम्मेद अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।

दूरदराज का क्षेत्र होने के कारण रात के समय कोई साधन सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण बालिका गृह की बालिकाओं को कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ समय पूर्व एक बालिका की तबियत खराब होने पर बालिका गृह की अधीक्षक ने मंडोर थाने से मदद मांगी, लेकिन पावटा पहुंचने तक बालिका की मौत हो गई।

मारुति वैन भेंट की

इस समस्या से निजात पाने के लिए संस्था अधीक्षक ने जिला कलक्टर, बाल अधिकारिता विभाग आयुक्त और सामाजिक न्याय अधिकारिता विभाग जोधपुर के उप निदेशक से लिखित में निवेदन किया। इस बीच ओएनजीसी के अधिकारियों को जब इस समस्या के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने जिला कलक्टर की अनुमति से एक मारुति वैन भेंट की। चौकीदार के विरुद्ध ड्राइवर रख कर वैन का उपयोग होने लगा। बच्चों को अस्पताल लाने ले जाने में सुविधा हुई, लेकिन इन सुविधाओं को कुछ ही समय में ग्रहण लग गया। तत्कालीन उप निदेशक की ओर से 27 अप्रेल 2016 को वैन संचालन बंद करने के निर्देश जारी कर दिए गए। पेट्रोल के बिल भी अस्वीकार कर दिए। नतीजतन संस्था के नाम से ईंधन का बिल बकाया चल रहा है।

सरकार तो सुनती नहीं, अब भामाशाह का इंतजार
वाहन की संस्था को नितांत आवश्यकता है। शिशु गृह, बालिका गृह में 40, कन्या छात्रावास, महाविद्यालय स्तरीय छात्रावास, नारी निकेतन की आवासनियों और वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्ग बीमार होने पर वाहन की कोई सुविधा नहीं है। गंभीर परिस्थितियों में उम्मेद अस्पताल, महात्मा गांधी अस्पताल में चिकित्सा और मानसिक विमंदित महिलाओं को मय शिशु मथुरादास माथुर अस्पताल ले जाना विकट हो जाता है। संस्था के आसपास दिन में भी ऑटो रिक्शा की सुविधा उपलब्ध नहीं होती है। वाहन चालक और ईंधन का खर्च प्रतिवर्ष करीब दो लाख रुपए है।
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इंश्योरेंस अवधि समाप्त
ओनएनजीसी ने जो वाहन बालिका गृह को भेंट किया था, वह अब ड्राइवर व ईंधन के अभाव में धूल फांक रहा है। एेसे में उसकी इंश्योरेंस अवधि भी खत्म हो चुकी है।
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पूरे राज्य में ड्राइवर का पद ही नहीं
राज्य में संचालित बालिका गृहों में कहीं भी ड्राइवर का पद ही नहीं है। एेसे में वाहन के ईंधन का बजट मिलना भी संभव नहीं है। वाहन तो हमारे पास पड़ा है। यदि कोई भामाशाह अथवा संस्था इसमें सहयोग के लिए आगे आती है तो हम उसका प्रस्ताव बना कर राज्य सरकार को भेज सकते हैं।
-बजरंगलाल सारस्वत
सहायक निदेशक, सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग
जोधपुर

 

 



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