मारवाड़ की ठिकाना बहियों में छुपा जन-जन का इतिहास

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जोधपुर.

राजस्थान में ठिकानों के दस्तावेज इतिहास के विभिन्न आयामों को प्रकट करने का महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं। मारवाड़ में शासकों के द्वारा जब किसी को गांव का पट्टा इनायत किया जाता था, तब उस गांव की रेख अंकित की जाती थी और उस रेख के हिसाब से पट्टेधारियों को राजकीय चाकरी भी करनी पड़ती थी। मारवाड़ में यदि कोई गांव 1000 रु. की रेख का होता तो उसे 1 अश्व सवार आपातकाल में राज्य के लिये भेजना ही पड़ता था। इसी तरह 750 रु. की रेख पर सुतर सवार (ऊंट सवार ), 500 रु. की रेख पर एक पैदल सैनिक भेजना पड़ता था। मारवाड़ में पोकरण ठिकाने की सबसे अधिक रेख एक लाख रु. थी।
राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर में रोहिट, खेजड़ला, बीकमकोर, कोरणा, बागावास व सुरायता ठिकानों की करीब 1581 बहियें सुरक्षित हैं। इन बहियों में ठिकानों की आय के स्रोत के अलावा, हासल, मुकाता, लाटा पर विस्तृत जानकारी मिलती है। बहियों में ठिकाने की आमदनी के अतिरिक्त माल सेरिणा, झूंपी, घासमारी, धुंआ भाछ आदि कई करों का भी उल्लेख मिलता है, जिससे ठिकानेदार का प्रजा के साथ सम्बन्धों को समझा जा सकता है।

ठिकानों की प्रत्येक बही पर विषय अंकित किया गया है। जैसे कि अन्न का कोठार, पाकशाला तालके, पट्टा तालके, उनाळू की जमाबंधी बही, सांवणू की जमाबंदी आदि सभी प्रकार की बहियों में ठिकाने और निवास कर रही प्रजा की दैनिक जीवनचर्या को बहुत ही करीब से समझ सकते हैं। ठिकानों के उद्योग-धन्धे, व्यापार-वाणिज्य, प्रशासन, खेती-बाड़ी के अलावा जन-जन की भागीदारी का उल्लेख भी इन बहियों में मिलता है।

ठिकानों की बहियों से यह भी ज्ञात होता है कि ठिकानेदारों की ओर से काम के बदले कामगार जातियों को उचित मजदूरी दी जाती थी। लकड़ी की भारी (बण्डल) लाने वाले सरगरा जाति के लोगों को, सूखी हुई गोबर के छाणे लाने वाले कुम्हारों को, घोडिय़ों के लिये घास का प्रबन्ध करने वाले मेघवाल जाति के लोगों को वेतन देने का बहियों में जगह जगह उल्लेख हुआ है। इसके साथ ही डाक ले जाने वाले को ठिकाने की ओर से 12 आना प्रतिदिन देने के साथ ही उसके भोजन का प्रबन्ध भी किया जाता था।
खरीफ एवं रबी की फ सलों में किस अनाज की पैदावार कितनी होती थी, इसका अनुमान भी इन बहियों से लगाया जा सकता है। अकाल, सुकाल, अतिवृष्टि, अनाज के भाव, माप तौल, कृषि यंत्र से जुड़े कितने ही पक्ष इन बहियों से उजागर होते हैं। आज के युग में केमिकल का प्रयोग कर जिस अन्न का उत्पादन किया जा रहा है, वह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे समय में कृषि की पुरानी पद्धति के अनुसार देशी खाद का प्रयोग कर अन्न उत्पादन की महत्वपूर्ण जानकारी ठिकानों के दस्तावेज में मिलती है। त्यौहार अथवा गमी पर सभी जातियों का उल्लेखनीय योगदान साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारे को भी प्रकट करता है।

इतिहास के पुनर्लेखन में होगा सहायक

पुरालेखीय सामग्री के माध्यम से ठिकानेदार का प्रजा के साथ सम्बन्धों को भलीभांति समझ सकते हैं। यदि हम ठिकानों का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास लिखना चाहें तो संस्थान में संग्रहित सामग्री बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इन ठिकाना दस्तावेजों पर कई शोधार्थी शोध कार्य कर रहे हैं। निश्चय ही ठिकानों का इतिहास प्रकाश में आएगा। यह इतिहास भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन में सहायक सिद्ध होगा।
विक्रमसिंह भाटी, सहायक निदेशक, रजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर.



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