पिता देश के लिए करगिल में हुए शहीद, बेटा एयरफोर्स में कर रहा है देशसेवा

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जोधपुर/मथानिया। करगिल शहीद किशनाराम जाखड़ की शहादत के 19 वर्ष बाद भी गांव की स्कूल का नाम उनके नाम से नहीं हो सका। नामकरण की फाइल सरकार के पास लम्बित पड़ी है। शहीद का परिवार लम्बे समय से सुविधाओं को तरस रहा है। मथानिया क्षेत्र के नेवरा रोड निवासी जांबाज सिपाही किशनाराम 15 अगस्त 1999 को जम्मू-कश्मीर में सुन्दरबनी के पास तवी इलाके में दुश्मनों से लोहा लेते हुए मातृभूमि के लिए शहीद हो गए थे। मुठभेड़ में भारतीय जाबाजों ने 7 आतंकियों को ढेर किया था। किशनाराम की शहादत पर भारतीय थलसेना अध्यक्ष ने उन्हें बैज ऑफ सेक्रिफाइस और सर्टीफिकेट ऑफ ऑनर दिया था। इसके बावजूद सरकारी घोषणाओं व पैकेज की कई सुविधाओं से शहीद का परिवार तरस रहा है।

 

बड़ा बेटा एयरफोर्स में कर रहा है देशसेवा
शहीद परिवार कई मुश्किल और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शहीद के पुत्रों व पुत्री ने बड़े पिता प्राचार्य डॉ. बंशीलाल जाखड़ के मार्गदर्शन में अच्छी शिक्षा हासिल की और आगे बढ़े। बड़ा पुत्र अर्जुनराम तीन वर्ष पहले वायु सैनिक बना। पुत्री पुष्पा ने नर्सिंग कर रखी है, जबकि छोटा पुत्र राजीव आइटीआइ कर रहा है।

 

धूल फांक रही फाइल
शहीद की पत्नी गंगा देवी ने बताया कि पति की शहादत को सरकार भूल गई है। नेवरा रोड का सीनियर विद्यालय घर के पास होने के बावजूद शहीद के नाम पर नहीं किया जा रहा है। सडक़ का नामकरण भी शहीद के नाम से नहीं होने से परिवार को दुख है। कारगिल शहीद पैकेज मे शहीद आश्रित को सरकारी नौकरी, पट्रोल पम्प या गैस एजेन्सी देना शामिल था, लेकिन वे भी नहीं मिले।

 

- मैंने पिता को नहीं देखा पिता की शहादत के समय में सिर्फ तीन माह का था। फिर भी उनकी बहादुरी के किस्सों को सुनकर जोश व जज्बा भर आता है कि मैं एक बहादुर पिता का पुत्र हूं। सरकारी सुविधाएं नहीं मिली, इसका अफसोस है।
राजीव जाखड़, शहीद का छोटा पुत्र



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