गजेंद्र सिंह दहिया/जोधपुर. जातीय हिंसा और गृहयुद्ध से जूझ रहे सूडान में ग्वार, मोठ व चंवला की फसलें लहलहाएंगी। इनसे वहां के निवासियों का पेट भरने के साथ व्यावसायिक उत्पादन भी करने से वहां के विदेशी मुद्रा भण्डार में वृद्धि हो सकेगी। सूडान ने इसके लिए जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के पूर्व दलहन वैज्ञानिक डॉ. डी कुमार की मदद ली है। डॉ. कुमार अगस्त के प्रथम सप्ताह में सूडान की राजधानी खार्तूम के लिए रवाना होंगे। प्राथमिक तौर पर वहां करीब एक हजार हैक्टेयर भूमि पर रेगिस्तान दलहन फसलों का प्रयोग किया जाएगा। उत्तरी-पूर्वी अफ्रीकी देश सूडान में बेऊडा, पूर्वी रेगिस्तान, लिबियन और न्यूबियन चार मरुस्थल हैं। मरुस्थल के साथ वहां मिट्टी का कटाव, अकाल, भुखमरी और नरसंहार की समस्याएं आम हैं।
वर्ष 2011 के भीषण गृहयुद्ध के साथ सूडान से अलग होकर दक्षिणी सूडान नामक नया देश अस्तित्व में आया था। अब सूडान की सरकार अपने निवासियों को बेहतर भोजन सहित आधारभूत सुविधाएं देने का प्रयास कर रही है। इसी सिलसिले में वहां की सीटीसी ग्रुप ऑफ कम्पनी ने मरुस्थलीय दलहन फसलों के तकनीकी हस्तांतरण के लिए काजरी से मदद मांगी है। काजरी में मरुस्थलीय दलहन पर काम करने चुके डॉ. कुमार सूडान में ग्वार, मोठ व चंवला उगाएंगे। इनके सफल रहने के बाद अन्य फसलों पर प्रयोग किया जाएगा। यहां केर, सागंरी, बेर, कुमट जैसी फसलें भी उगाई जा सकती हैं, जिसमें काजरी को महारत हासिल है।
कूमठ से बनाते हैं गम
वर्तमान में सूडान में कूमठ से गम अरेबिक प्राप्त कर निर्यात किया जाता है, जो ग्वार की तुलना में कमतर होता है। सीटीसी कम्पनी वर्षा पर आधारित और सीमित जल द्वारा खेती करने के लिए सक्रिय हुई है। कम्पनी द्वारा अधिक उत्पादन, मूल्य संवद्ध्र्रन और प्रसंस्करण पर जोर दिया जा रहा है। काजरी की तकनीक सफल रहने पर कम्पनी ग्वार सप्लीमेंट्स और कोरमा का निर्यात करेगी।
देखते हैं, कौनसी प्रजाति काम करती है
सूडान में भी मरुस्थलीय परिस्थितियां हैं। ग्वार, मोठ, चंवला फसलों की विभिन्न प्रजातियों और उनकी तकनीक का वहां के वातावरण में प्रयोग किया जाएगा। सफल रहने पर उसका वृहद स्तर पर उत्पादन किया जाएगा।
डॉ. डी कुमार, पूर्व दलहन वैज्ञानिक, काजरी, जोधपुर
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