हजारों पाकिस्तान विस्थापितों की पढ़ाई की राह में दुश्वारियां

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एम आई जाहिर

जोधपुर. यह उनके पुरखों की जमीन है और बंटवारे के कारण जमीन बंट गई तो सरहद पार से यहां उनका आ कर रहना , कमाना और पढऩा सब दुश्वार हो गया है। पाकिस्तान विस्थापितों की नई पीढ़ी नागरिकता के जटिल नियमों का दंश भुगत रही है। हालत यह है कि राजस्थान में रह रहे लगभग 4000 बच्चों सहित 6000 पाकिस्तान विस्थापित विद्यार्थियों को शिक्षा हासिल करने में दिक्कत पेश आ रही है। केवल जोधपुर में ही लगभग पांच हजार विस्थापित विद्यार्थियों में से स्कूल जाने की उम्र वाले लगभग आधे से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा से वंचित हैं। इन पाकिस्तान विस्थापित छात्र-छात्राओं में से अधिकतर जोधपुर और जैसलमेर रहने वाले विस्थापित परिवारों के विद्यार्थी हैं। राजस्थान पत्रिका ने विस्थापित बच्चों की शिक्षा में आ रही दुश्वारियों का जायजा लिया तो यह ग्राउंड रिपोर्ट सामने आई।

मामूली कामकाज कर के परिवारों की रोजी-रोटी में मदद करते हैं

जानकारी के अनुसार इन पाकिस्तान विस्थापित विद्यार्थियों में लगभग 5000 बचे अलग अलग कार्यों में मामूली कामकाज कर के अपने परिवारों की रोजी-रोटी में मदद करते हैं। विस्थापित विद्यार्थियों के शिक्षा प्राप्त करने की समस्या का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ने अलग-अलग नोटिफिकेशन आदेश दे रखे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि रोजाना विस्थापित विद्यार्थियों को आज भी केवल यह कह कर शिक्षण संस्थानों मेें दाखिला नहीं दिया जा रहा कि वे पाकिस्तान के नागरिक हैं।

केस-1

देवी का दर्द

पाकिस्तान सिन्ध के मीरपुर खास से जोधपुर आई देवीकुमारी ने राजस्थान स्टेट ओपन स्कूल जयपुर में एडमिशन के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन उसकी अर्जी केवल इस कारण ठंडे बस्ते में डाल दी गई कि वो पाकिस्तानी नागरिक है। देवी चार साल पहले सिन्ध पाकिस्तान से पलायन कर के अपने माता पिता के साथ जोधपुर कर आ बसी है। देवीकुमारी ने कहा, मैं अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए ओपन स्कूल में दाखिला लेना चाहती हूं, लेकिन मुझे सिर्फ इसलिए एडमिशन नहीं मिल रहा है कि मैं पाकिस्तान विस्थापित हूं।
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केस-2
अमरो की अरदास

जोधपुर की आंगणवा बस्ती में रह रहे पाकिस्तान विस्थापित अमरो कोली अपने परिवार में अकेले कमाने वाले हैं, लेकिन उनके 6 बच्चे और बूढ़े माता-पिता भी हैं। अमरो केवल मजदूरी से अपना घर नहीं चला पा रहे हैं। इसलिए वो अपने दो बड़े बेटों प्रेम (16 )और हरिलाल ( 14) को स्कूल नहीं भेज पा रहे,इसलिए उन्होंने उन दोनों को मजदूरी करने के काम पर लगा दिया है।

मौका मिलने से आसान होती है मंजिल

पाकिस्तान विस्थापित गरीब विद्यार्थियों को रहने में भी दिक्कत पेश आ रही है। जोधपुर नगर निगम के आश्रय अस्थल की सहूलत भी बच्चों का भविष्य उज्जलवल बनाने में कारगर साबित नहीं हो रही है। ध्यान रहे कि हजारों पाकिस्तान विस्थापित परिवार बिना सुविधाओं के कच्ची बस्तियों में रह रहे हैं। वहीं कुछ परिवार गोकुल जी की प्याऊ आश्रय स्थल में रहते हैं। हालांकि पाकिस्तान विस्थापित महिलाएं सिलाई कर के अपनी आजीविका चला रही हैं। वहां पहली बार दो विस्थापित बच्चे वर्षा पुत्री अमरो व भारत कुमार पुत्र दीवान का खूब पढ़ाई करने के कारणयूरो इंटरनेशनल स्कूल में स्कॉलरशिप के साथ छठी कक्षा में चयन हुआ है। आश्रय अस्थल में रहने वाले हेमजी कोली ने बताया के आश्रय अस्थल में बच्चों को पढ़ाया जाता है और वहां बिजली नहीं होने के बावजूद बच्चे रात देर तक पड़ते हैं। इसलिए दो विस्थापित बच्चों को जोधपुर के एक बड़े स्कूल में स्कॉलरशिप के लिए चयन हुआ है। यह गरीब विस्थापतों के लिए गर्व की बात है।
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एजुकेशन सेंटर की जरूरत
पाकिस्तान विस्थापित बच्चों की शिक्षा की समस्या के समाधान की तो समस्या है ही। विस्थापित परिवारों की आजीविका व आश्रय जैसी समस्याएं भी समझ कर उन का भी समाधान करना होगा। ये सभी समस्याएं आपस में जुडी हुई हैं। इन बच्चों के उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश की तैयारियों के लिए एक एजुकेशन सेंटर की जरूरत है। इसकेलिए हमारे प्रयास जारी हैं। हम आने वाले दिनों में यह सुनिश्चित करेंगे कि विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों में अधिक से अधिक विस्थापित बच्चे एडमिशन लेने के लिए पूरी तैयारी के साथ कॉम्पीट कर सकें।

हिन्दूसिंह सोढ़ा

अध्यक्ष, सीमांत लोक संगठन

जोधपुर



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