कुदरती खूबसूरती पर बदइंतजामी के दाग :मंडोर गार्डन से टूट रही है मन की डोर

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मंडोर लाइव

जोधपुर. राज्य की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर शहर में देसी विदेशी पर्यटकों में लोकप्रिय रहा मंडोर एक बाग एेसा है जिसे पूरा देखने और घूमने के लिए पूरा एक दिन चाहिए। दरअसल मंडोर उद्यान जोधपुर की एक पुरानी पहचान है। सूरज के शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक बाग। इसके दो गेट हैं, पहला मुख्य द्वार और दूसरा पिछला गेट। यह इतना बड़ा बाग है कि इस जगह घूमने के लिए पूरा एक दिन चाहिए। जोधपुर शहर के बाशिंदे बारिश में भीगे मंडोर गार्डन आ कर सैर सपाटा और गोठ कर रहे हैं।

भ्रमण दल भी खूब आ रहे हैं

यहां देसी विदेशी सैलानी और स्कूलों कॉलेजों के भ्रमण दल भी खूब आ रहे हैं। यानी पिकनिक और सैर सपाटे के लिए यह अहम स्थान है। कई फिल्मों व विज्ञापनों की शूटिंग का साक्षी है। ऊंची पहाड़ी से भी इसका दृ़श्य खूबसूरत नजर आता है। हालांकि इन दिनों बारिश के बाद तो इसका प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बन रहा है और हरियाली लोगों को इसकी ओर खींच रही है। इसके उलट इस बाग की सार संभाल की ओर खास ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालत यह है कि जगह-जगह कुर्सियां टूटी हुई हैं। उद्यान में जगह-जगह गंदगी नजर आ रही है। इस कारण पर्यटक निराश हो रहे हैं। बदइंतजामी की वजह से इस बाग मेंं आने वाले लोग इसकी बदहाली देख कर दुखी हो रहे हैं।

फलों और फूलों से लदा बाग

क्या आपको पता है कि यहां पुराने समय में मण्डोर के बाग में कई फलदार पौधे लगाए गए थे। यहाँ जामुन, आम और अमरूद प्रसिद्ध रहे हैं। जब कभी बड़ी संख्या में गुलाब, चमेली और मोगरा आदि फू लों की जरूरत होती थी, तब यहीं से फूल लिए जाते थे। रियासतकाल में मण्डोर का बाग बहुत ही सुन्दर और स्वच्छ था। इतिहास के अनुसार पुराने जमाने में मण्डोर एक विस्तृत नगर व मारवाड़ की राजधानी के नाम से मशहूर था।

देवी देवताओं की साल भी बदहाल

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि मण्डोर के जनाना महलों व अजीतपोल के पास पहाड़ी को काटकर बनाई गई 16 मूर्तियों के इस बरामदे को देवी-देवताओं की साल, वीरभवन और वीरविधिका के नाम से पुकारे जाते हैं। यहां देवताओं की साल महत्वपूर्ण स्थल है। इसे माण्डयपुर, मण्डोवर भौगीशेल आदि नामों से पुकारा जाता रहा है। ये मूर्तियां महाराजा अजीतसिंह के काल में शुरू होकर महाराजा अभयसिंह के काल में पूर्ण बन कर तैयार हुई। इनका निर्माण काल 1707 ई. से लेकर 1749 ई. तक रहा। इन मूर्तियों में 9 तो देवताओं और 7 वीर पुरुषों की है। जिनमें से कुछ घोड़ों पर सशस्त्र सवार है। ये मूर्तियां कारीगरी की दृष्टि से बहुत खूबसूरत हैं। हर मूर्ति लगभग पन्द्रह फीट ऊंची है और प्रतिमाओं की आंखें निजी विशेषता रखती है। इनमें वीरता व शौर्य दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त वीरों के कपड़ों की सलवटों का प्रदर्शन, चेहरे की बनावट, आभूषण और मूंछें इनकी कुछ अन्य विशेषताएं हैं। आज देवताओं की साल भी बुरी हालत में है।

इसमें सुधार करवाए थे

महाराजा अजीतसिंह और महाराजा अभयसिंह के शासनकाल (1714 ई. से लेकर 1749 ई.) में जोधपुर नगर का मण्डोर उद्यान व उसके संलग्न देवी-देवताओं की साल और मण्डोर की पुरानी कलात्मक इमारतें अजीत पोल इक थम्बिया महल, पुराना किला व उसके नीचे वाले मेहलात (वर्तमान म्यूजियम भवन) ऐतिहासिक व कलात्मक देवल, थड़े व छत्रियों, नागादरी के संलग्न कुंओं, तालाबों व बावडिय़ों इत्यादि का निर्माण हुआ।बदलती रही मंडोर की शक्लमहाराजा उम्मेदसिंह से लेकर महाराजा हनवन्तसिंह के शासनकाल तक मण्डोर गार्डन में कई सुधार कार्य हुए। वहीं 1923 ई. से 1947-48 ई. के दौरान मण्डोर गार्डन को आधुनिक ढंग से तैयार करवाया गया। आजादी के बाद मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा के समय वित्त मंत्री मथुरादास माथुर के प्रयासों से मण्डोर गार्डन की काया पलट करवाई गई। उद्यान में पानी के हौज, सर्च व फ्लड लाइटें व फव्वारे आदि लगाए गए और मण्डोर में गार्डन के ऊपर ऊंचाई वाले पहाड़ पर हैंगिंग गार्डन भी लगवाया गया। उद्यान के आधुनिक ढंग से विकास के लिए पीडब्ल्यूडी व उद्यान विभाग का भी योगदान सराहनीय रहा। इसकी कायापलट करने में मगराज जैसलमेरिया, सलेराज मुणोहित और दाऊदास शारदा की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

जातरुओं का पसंदीदा स्पॉट

मंडोर बाग में बंदर और लंगूर खूब यह पर्यटन स्थल रामदेवरा मेले के लिए आने वाले जातरुओं का पसंद स्थान है। यहां पुरातत्व विभाग का राजकीय संग्रहालय है। यही नहीं हौज, नागादड़ी और पचकुंडा लोगों के तैरने के प्रमुख स्थान बन गए हैं। आज इसके पिछले हिस्से में नागादड़ी कुंड है। आज बाग में बंदर और लंगूर खूब हो गए हैं।

मंडोर फैक्टफाइल

जोधपुर शहर से दूरी : 8 किलोमीटर

मंडोर उद्यान का निर्माण : 1714 ईस्वीं से लेकर 1749 ईस्वीं

मण्डोर गार्डन सुधरा : 1896 ईस्वीं में

आधुनिक रूप : 1923 ई. से 1947-48 ईस्वीं

देवताओं की साल : 9 देवता, 7 वीर पुरुष

कभी दरोगा करते थे

मंडोर की देखभाल रियासतकाल में यहाँ पर राज्य की तरफ से नियुक्त पदाधिकारी इसकीदेखभाल किया करते थे। जोधपुर राज्य की ओहदा बही के मुताबिक मण्डोर बाग की देखभाल के लिए दरोगा नियुक्त होता था। कोतवाली के चौतरें से भी इसकी देखभाल होती थी। बही में फौजदार गुलाब खां को इसकी देखरेख की जिम्मेदारी सौंपने की जानकारी मिलती है।

--इनका कहना है--

दीवारें टूटी हुईमंडोर मे नागादड़ी का ओटा पूरा डटा हुआ है, यहां से पानी ओटा से होकार हौद में आता है। इसकी दीवारें जगह-जगह दीवारें टूटी हुई हैं। इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

-आनंदसिंह गहलोत, क्षेत्रवासी

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करंट का अंदेशा

ये बारिश के दिन हैं और मंडोर में गार्डन में बिजली के पैनल बाक्स खुले पड़े हुए हैं, जिनमें कंरट आने का अंदेशा है।एेसी लापरवाही किसी की जान पर भारी पड़ सकती है।

-हरिसिंह, क्षेत्रवासी

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थोड़ा तो ध्यान दें

मण्डोर गार्डन के अन्दर नया शौचालय बना है, जिस पर ताला लगा हुआ है। पानी की नहरे डटी पड़ी हैं और पानी के हौद में भी कचरा है, जिसमें घास उग आई है, यह तैराकों और नहाने आने वालों के लिए मुश्किल पैदा कर रहा है।

-हेपासिंह राठौड़

पर्यटक, जोधपुर

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रास्ते में गंदगी

बारिश का मौसम आ गया है, लेकिन मंडोर के हौद की सफाई नहीं हुई है। यहां पर लोग बन्दरों को खाना खिलाने आते हैं, लेकिन वे खाना सड़क पर ही डाल कर चले जाते हैं, इस कारण रास्ते में गंदगी फैल जाती है।

-लक्ष्मणसिंह सोलंकी

क्षेत्रवासी, जोधपुर



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