सरकारी महकमे ही बर्बाद करने पर तुले जोधपुर की वनभूमि, चौंकाने वाला है ये मामला

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?


जोधपुर/मंडोर. मंडोर क्षेत्र की रक्षित वन भूमि मगजी घाटी में जिला प्रशासन की ओर से सड़क, पानी, बिजली की नि:शुल्क सुविधाएं मुहैया होने के बाद अब नगर निगम ने शौचालय की सुविधा उपलब्ध करा दी है। वृक्षविहिन वन क्षेत्र में अंधाधुंध सीमेन्ट व कंक्रीट का जाल फैलता जा रहा है। जनप्रतिनिधियों ने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हुए बिजली के अंधाधुंध खंभे लगवा दिए। जलदाय विभाग की ओर से पानी की टंकी का निर्माण करा दिया गया है। वनभूमि पर बसने वाले आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता परिचय पत्र, भामाशाह कार्ड, पेनकार्ड तक बना दिए गए है। एक सरकारी स्कूल भी संचालित हो रही है। क्षेत्र की भूमि पर अतिक्रमण कर पक्के मकान बनाने वाले सीधे हुक डालकर बिजली का नि:शुल्क उपभोग कर रहे है। हरा-भरा करने या बस्ती बसाने के लिए वनविभाग के किसी अधिकारी ने चार दशक में क्षेत्र में पौधे लगाने की जहमत नहीं उठाई।

 

बिजली के पोल में 'पोल'

सुप्रीम कोर्ट की ओर से 12 दिसम्बर 1996 को दिए आदेश के अनुसार किसी भी वनभूमि पर निर्माण अथवा किसी भी तरह की सुविधाएं मुहैया करवाने से पूर्व केंद्र सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य है। इस आदेश के बावजूद वन क्षेत्र में बिजली के खंभे पहुंचे। बेरीगंगा रक्षित वन खंड का अंतिम गजट नोटिफिकेशन वर्ष 1994 के दौरान राजस्थान राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इस क्षेत्र में अवैध खनन सहित कुल 519 प्रकरण दर्ज हुए। इनमें 278 निर्णित प्रकरण में अधिकांश लोगों को बेदखली के लिए अबतक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। मंडोर क्षेत्र का तो प्रमाणित नक्शा नहीं होने का रोना लंबे अर्से जारी है। यह रोना ही भू व खनन माफियाओं की ताकत बनता जा रहा है।

 

ऐसे तो नामो-निशां भी नहीं बचेगा वनभूमि का
जिस तेजी से आरक्षित वन क्षेत्र में बस्तियां बस रही हैं उस तेजी से आने वाले एक दशक में वनभूमि का नामो-निशां मिट जाएगा। वनक्षेत्रों की पहाडिय़ों को काटकर सीमेन्ट व कंक्रीट के जाल में तब्दील करते देख जिला प्रशासन के अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी पूरे शहरवासियों के लिए भविष्य में बड़ी परेशानी का कारण बन रही है। वन रक्षक व क्षेत्रीय वन अधिकारियों की मिलीभगत से वनभूमि की बर्बादी का खेल चल रहा है। जोधपुर के वनखंड व्यास की बावड़ी, भूतेश्वर, देवकुण्ड, लालसागर, चांदणा, माचिया, मोतीसरा, बड़ा भाखर, बेरीगंगा क्षेत्र में कुल 6543.87 हेक्टेयर वन भूमि है। इनमें 500 से अधिक हेक्टेयर रकबे पर करीब 20 हजार से अधिक अतिक्रमण है। इनमें सर्वाधिक व्यास की बावड़ी में 2908, भूतेश्वर ( प्रतापनगर) वन खंड में 2 हजार, देवकुण्ड में 1500, लालसागर में 3929, बड़ा भाखर में 100, बेरीगंगा में एक हजार व अन्य वनभूमियों पर करीब 3 हजार से अधिक अतिक्रमण हो चुके हैं।


खनन बंद, अतिक्रमण चालू

बेरीगंगा वन क्षेत्र के मगजी घाटी क्षेत्र में अवैध खनन पर तो जिला प्रशासन ने अंकुश लगा दिया, लेकिन वन भूमि पर अतिक्रमण करने वालों पर कार्रवाई नहीं की जा रही है। डायवर्जन प्रस्ताव के माध्यम से वनभूमि को वन क्षेत्र टाइटल से मुक्ति की कवायद भी पिछले कई सालों से जारी है।

 

पूरे प्रदेश में वन संरक्षण अधिनियम प्रभावी नहीं
वनभूमि की सुरक्षा के लिए बना वन संरक्षण अधिनियम-1980 (एफसीए) लागू होने के करीब 38 साल बाद भी प्रदेश में कहीं प्रभावी होता नजर नहीं आता है। राज्य सरकार ने वनों के प्रति संवेदना को समझते हुए राजस्थान वन अधिनियम 1953 लागू किया था। इससे आम आदमी तो वन अपराधों से दूर रहने लगा, लेकिन सरकारी विभागों ने वन क्षेत्रों में खनन आदि गैर वानिकी कार्यों के माध्यम से भारी तबाही मचाई। राजस्थान के अलाव देश भर में यह समस्या को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 अक्टूबर 1980 को पूरे भारत में ही वन संरक्षण अधिनियम लागू किया।

 

आखिर क्या है वन संरक्षण अधिनियम 1980

अधिनियम के तहत वन भूमि में किसी भी प्रकार का गैर वानिकी कार्य अथवा वन भूमि का किसी भी रूप में प्रयोग करने के लिए देश के सभी सरकारी विभाग के अधिकारियों यहां तक राज्य सरकार को भी भारत सरकार से स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है। उल्लंघन पर दोषी पाए जाने वाले सरकारी अधिकारी को 15 दिन कारावास का प्रावधान किया गया। यह कानून लागू होने के बाद भी प्रदेश के सभी जिलों में हजारों की संख्या में वनभूमि पर इसका खुला उल्लंघन हो रहा है। वनभूमि में बिजली के पोल लगाने के लिए, जलदाय विभाग की ओर से बिना केन्द्र सरकार की अनुमति के पानी की टंकियां बनाने, निकायों की ओर से सामुदायिक भवन, टेलीफोन केबल तथा सड़क निर्माण किया गया। बावजूद इन सभी मामलों में किसी दोषी सरकारी अधिकारी के खिलाफ एक भी प्रकरण दर्ज नहीं किया गया। जोधपुर में वनभूमि पर 40 से अधिक कच्ची बस्तियां आबाद होकर 20 हजार से अधिक छोटे-बड़े अतिक्रमण हो चुके हैं। इन बस्तियों में भारत सरकार की अनुमति बिना सड़क निर्माण, पानी की लाइनें व हजारों की संख्या में बिजली के पोल लगा दिए, लेकिन इसमें कभी कोई सरकारी अधिकारी के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2JVQFVK
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment