धरोहर : मंडोर किला उल्टा होने की कोरी अफवाह

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जोधपुर /मंडोर. मंडोर किले के साथ यह मान्यता जुड़ी हुई है कि यह किसी शाप अथवा प्राकृतिक आपदा के चलते उल्टा हुआ है, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों की वर्ष 1883 व सर मार्शल की 1917 में सचित्र प्रामाणिक रिपोर्ट में भी किला उल्टा होने का कोई उल्लेख नहीं है। जोधपुर के इतिहासविद् भी किला उल्टा होने की बात को कोरी कल्पना व अफवाह मात्र मानते हैं। जोधपुर के मंडोर उद्यान परिसर में स्थित चौथी शताब्दी ईस्वीं के मंडोर किले को उल्टा किला भले ही कहा जाता हो, लेकिन इतिहावविद इसे नकारते हैं।

तोरणद्वार पर कृष्ण लीलाएं अंकित

मंडोर किले की वास्तविकता यह है कि वर्ष 1917 में भारत के विभिन्न स्थानों पर शोध करने वाले इतिहासकार मार्शल ने सीधे किले की मय तोरणद्वार सचित्र रिपोर्ट सौंपी थी। यह तोरणद्वार जोधपुर के उम्मेद उद्यान के सरदार राजकीय संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। पाषाण के 12 फीट लंबे और दो फीट चौड़े चौथी शताब्दी के कलात्मक तोरणद्वार के तोरण स्तंभ पर भगवान कृष्ण की लीलाओं-कृष्णद्वार, गोवद्र्धन पर्वत धारण करते कृष्ण, दधिमंथन, शकटभंग, अरिष्ठासुर दैत्य से युद्ध और केशीनिषुदन का मार्मिक चित्रण है। इतिहासकार दो दशक से मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मंडोर के किले से जुड़ी भ्रांतियों पर जमी धूल हटाकर मिथक और अफवाहों के कारण उल्टा कहे जाने वाले मंडोर किले के रहस्य से पर्दा हटाने में जुटे हुए हैं।

इन्दा परिहारों ने राठौड़ों को सौंपा

जमींदोंज हो चुके किले की नई तस्वीर उभरने से पर्यटन के क्षेत्र में नए द्वार खुलने का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। पुरातत्व विभाग के निर्देशन में क्षेत्र की खुदाई के दौरान पांचवीं और आठवीं शताब्दी की गणेश, देवी की मूर्तियां,कीचक व त्रिमूर्ति,गजलक्ष्मी मंदिर, बर्तन और धार्मिक चिह्नों के साथ एक पूर्ण मंदिर भी मिला था। खुदाई के दौरान मिले विक्रम संवत 894 के एक शिलालेख के अनुसार मंडोर में नागवंशी क्षत्रियों का राज्य था, जिन्हें प्रतिहारों ने पराजित कर अपना साम्राज्य और किला स्थापित किया था। इन्दा परिहारों ने सन 1394 में राठौड़ों को दुर्ग दिया, जो बाद में वर्ष 1459 में जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग निर्माण कर वहीं रहने लगे।

निर्माता का पता नहीं
मारवाड़ की प्राचीन ख्यातों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि राव जोधा ने जब जोधपुर बसाने के लिए मेहरानगढ़ की स्थापना की थी, तब नागवंशियों की गहरी साख के चलते मेहरानगढ़ का नाम मयूरध्वज गढ़ अथवा मोरध्वज गढ़ रखा था। मोर और नाग में आपसी दुश्मनी जग जाहिर है। एएसआई के उपअधीक्षक पुरातत्ववेत्ता डॉ. ए झा के अनुसार सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच यहां मंदिर भी बनाए गए थे, जिनसे उस समय के लोगों की धार्मिक आस्था के बारे में पता चलता है। इसके पूरे विकासकाल में इतिहास में कहीं किसी किले या इसे बसाने वाले राजा का नाम अभी तक सामने नहीं आया है। खुदाई में भी अब तक एेसा कोई अवशेष नहीं मिला है, जिससे किले के निर्माता का नाम उजागर हो सके।

कोई गोद लेने वाला नहीं

किले का अब एक मात्र रक्षक मारवाड़ की राजधानी मंडोर आज वह तपोवन नहीं रहा, जहां कभी रणबंका राठौड़ों के तेजस्वी चरित्र व गतिपूर्ण विजयों के इतिहास से कई पृष्ठ निबद्ध हुए थे। जिस मंडोर किले को पाने के लिए राव जोधा लंबे अर्से तक जंगलों में भटकते रहे, वही किला अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण किसी भी एजेंसी को गोद देने के लिए तैयार है, लेकिन कोई भी किला गोद लेने के लिए तैयार नहीं हो रहा है।

इतिहासविदों का कहना है

सन 1917 में ब्रिटिशकाल के इतिहासकार सर मार्शल और बहल की संयुक्त सचित्र प्रामाणिक रिपोर्ट में मंडोर किला कभी भी उल्टा होने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। सचित्र रिपोर्ट में तोरणद्वार का चित्र भी प्रकाशित है। जर्जर होने के कारण वही तोरण द्वार आज सरदार राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित है। रही बात खजाना दबे होने की, तो राव जोधा ने जब राजधानी को मेहरानगढ़ शिफ्ट कर दिया था तो भला खजाना वहां क्यों छोड़ेंगे। एेसी कई काल्पनिक बातें बनती हैं और समानांतर चलती हैं। भूकंप से जर्जर किला ढह जाता है तो वह उल्टा कैसे हो सकता है।
जहूर खां मेहर

इतिहासकार





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