- दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में बढ़ा मरुस्थलीकरण
- काजरी और इसरो के शोध में खुलासा
गजेंद्रसिंह दहिया/जोधपुर. बड़े-बड़े टीले, दिन भर उड़ती बालू और नागफनी, बांवळिया जैसे कांटेदार पौधों की धरा कहे जाने वाले मरुप्रदेश राजस्थान की फिजा अब बदल रही है। पिछले 60 साल के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में एक लाख हेक्टेयर बंजर भूमि पर हमने खेत-खलिहान लगा दिए। जहां कभी मीलों दूर तक बालू के टीले दिखाई देते, वहां अब फसलें लहलहा रही है।
राजस्थान ने रेगिस्तान का मार्च रोक दिया है। राजस्थान के अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में पिछली आधी सदी में मरुस्थलीकरण ने पांव पसारे हैं। यह खुलासा केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) और इसरो की ओर से किए गए शोध में हुआ है। इसरो और काजरी ने 1957 से 2014 तक के डेटा का विश्लेषण किया। रिमोट सेंसिंग व जमीन तकनीक के इस्तेमाल से दोनों संस्थाओं ने प्रदेश में मरुस्थलीकरण के रुकने की बात कही है। साथ ही प्रदेश में भू-जल के अत्यधिक दोहन से आने वाले समय के लिए चिंता भी जताई है।
60 साल में राजस्थान में क्या-क्या बदला
- वर्ष 1957 में सिंचित क्षेत्रफल 0.70 प्रतिशत था जो 2014 में बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया।
- सकल बुआई 35 फीसदी हुआ करती थी जो 2016 में 53 फीसदी हो गई।
- पड़त भूमि (जो एक-दो साल तक बगैर खेती के छोड़ दी जाती है) 9 प्रतिशत थी जो अब 7 प्रतिशत रह गई।
- वर्ष पड़त भूमि (जहां लम्बे समय से कृषि नहंी हुई) 14 प्रतिशत थी जो घटकर 7 प्रतिशत रह गई।----
बालू के उठने की ताकत 3 प्रतिशत कम
पश्चिमी राजस्थान में आधी सदी पहले तक धूल से उठने वाले बवण्डर 'वैरी सीवियर कैटेगरीÓ के थे जो अब 'मोडरेट कैटेगरीÓ के रह गए। वर्ष 1960 में वायु अपरदन 76 फीसदी हुआ करता था जो घटकर 73 फीसदी तक आ गया है। हरियाली ने बालू के पांव जमीन पर टिका दिए हैं। तेज हवा बहती भी है तो बालू अधिक ऊंचाई तक नहीं जा पाती। -----
पहले सर्वे करने जाते, तो खुद ही मिट्टी हटाते
काजरी व इसरो के सर्वे में सामने आया कि राजस्थान में मरुस्थलीकरण रुक गया है। मरुस्थल तो यहां हमेशा रहेगा, लेकिन अब बालू स्थिर हो गई है। मुझे याद है पहले जब मैं जैसलमेर-बाड़मेर सर्वे के लिए जाता था तो सड़क से मिट्टी खुद ही हटानी पड़ती थी। इंदिरा गांधी कैनाल आने के साथ थारवासियों का आर्थिक स्तर ऊंचा होने से भी खेती को बढ़ावा मिला है।
डॉ. पीसी मोहराणा, प्रधान वैज्ञानिक, काजरी, जोधपुर
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