जोधपुर . सांस्कृतिक राजधानी सूर्यनगरी में आस्था का कुंभ अपने चरम पर है। हरिनाम संकीर्तन के बीच आस्था के महानुष्ठान भोगिशैल परिक्रमा सोमवार अलसुबह पथरीले उबड़-खाबड़ मार्ग से होकर पांचवे पड़ाव स्थल पर पहुंचनी शुरू हो गई है। परिक्रमा सचिव विष्णुचन्द्र प्रजापति ने बताया कि भोगिशैल परिक्रमा सोमवारसुबह बैजनाथ से रवाना होकर मंडलनाथ, कुंडली माता, जोगी तीर्थ व दईजर माता के दर्शन करते हुए दुर्गम पथरीले व पहाड़ी रास्ते से होकर पांचवे पड़ाव स्थल बेरीगंगा पहुंच रही है। भोगिशैल परिक्रमा के दौरान करीब तेरह किलोमीटर का पूरा मार्ग दुर्गम और कठिन माना जाता है।
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण भी करें सुनिश्चित
वन्यजीवों व पर्यावरणीय दृष्टि से धार्मिक भोगीशैल परिक्रमा के स्थलों का विशेष महत्व है। भोगीशैल परिक्रमा के ज्यादातर स्थल किसी न किसी वन्यजीवों, पक्षियों व सरिसृपों के स्थाई आवास है। इन स्थानों में बैजनाथ, मण्डलनाथ, दईजर, निंबा निंबडी, बैरीगंगा, मण्डोर व कागा प्रमुख है। इन स्थानों पर बंदरों के आवासीय स्थल भी है जहा पर 40 से 50 समूहों के करीब दो हजार बदरों का प्राकृतिक वास है। भोगीशैल परिक्रमा के दौरान कुछ सावधानियों से इस वन्य जीवों को बेमौत मरने से बचाकर उनकी रक्षा की जा सकती है। इसके तहत बंदरों व अन्य वन्यजीवों को सड़ा गला, तला हुआ या मीठे पदार्थ का सेवन नहीं कराएं तथा किसी भी प्रकार का कृत्रिम या संक्रमित खाना वन्यजीवों को नहीं डालें। ताजे फ ल सब्जियां ही अगर जन भावनाओं के तहत खिलाते हैं तो वन्यजीवों के संरक्षण मे महत्वपूर्ण योगदान रहेगा।
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अनिल छंगाणी ने बताया कि बच्चों को बंदरों व वन्यजीवो से छेड़छाड़ से रोकना चाहिए वरना गर्मी में बंदर चिड़चिड़ा होकर काट सकता है। प्लास्टिक की थैलियों व अन्य पदार्थो को एक निश्चित स्थान पर एकत्रित करना चाहिए वरना जानवर उसे खाकर बेमौत मारे जाते हैं। इन कुछ सामान्य सावधानियो के चलते भोगीशैल परिक्रमा के दौरान हजारों लोगों की उपस्थिति में भी वन्यजीवों को सामान्य दिनचर्या व संरक्षण मिलेगा जो कि हमारी नई पीढ़ी के लिए सीखने व समझने का अच्छा परंपरागत अवसर है।
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