फूटी मटकी नहीं मुगल सुबेदार का सिर है ये, इसलिए निभाई जाती है ये परंपरा

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ऐसा होता है घुड़ला।
जोधपुर। मारवाड़ में इन दिनों रोज शाम गली-गली एक गीत सुनने को मिल जाता है कि घुड़लो घूमे ला जी घूमेला...अर्थात घूड़ला घूमता ही रहेगा। ये छोटी सी मटकी या घड़ा, दरअसल सालों पहले मारे गए मुग़ल सूबेदार घुडले खान के कटे हुए सिर का प्रतीक मानी जाती है। इसे मारकर महिलाओं को आज़ाद कराया गया था इसलिए हर साल इसके कटे हुए सर को लेकर घूमने की परंपरा है। क्या हुआ था महिलाओं के साथ और क्यूँ घड़े को बना दिया जाता है कटा हुआ सिर.... 



घुडले खान ने किया था महिलाओं को किडनैप..
- जोधपुर की स्थापना करने वाले राव जोधा का पुत्र राव सातल वर्ष 1545 में मारवाड़ की गद्दी पर बैठे। इनके दो पुत्र थे दूदाजी व परसिंह।
- इनके राज में अजमेर के शाही सूबेदार मीर घुड़ले खान, मल्लू खान व सीरिया खान ने बड़ी सेना लेकर जोधपुर के पीपाड़ में हमला कर दिया।
- इस शाही सेना ने पीपाड़ में भारी लूटपाट कर महिलाओं को किडनैप किया और रवाना हो गए।
- सूचना मिलने पर राव सातल ने अपने दोनों पुत्रों के साथ मिलकर शाही सेना पर कोसाणा के निकट हमला बोला।
- इस युद्ध में राव सातल ने घुड़ले खान को मार कर महिलाओं  को मुक्त कराया, लेकिन खुद मारे गए।
- युद्ध के बाद घुड़ले खान का सिर जोधपुर लाया गया और मारवाड़ में विजयी उत्सव मनाया गया।

हर साल घड़े में छेद करके बनाए जाते हैं जख्म
- महिलाओं की मुक्ति के इस पर्व को उसके बाद से हर साल मनाया जाता है।
- इसके तहत महिलाएं मिलकर एक छोटा घड़ा खरीदती है। इस घड़े पर घुड़ले खान के चेहरे पर हुए घाव के प्रतीक के रूप में छिद्र करवाती है।
- इसके बाद घड़े को रंगों की आकर्षक कलाकारी से रंग कर इसमें एक दीपक रख वे गीत गाती हुई शहर में रोज शाम को घूमने निकलती है।
- किसी के घर जाने पर वहां की महिलाएं इनका स्वागत करती है और दीपक के दर्शन कर उस पर चढ़ावा चढ़ाती है।
- चैत्र नवरात्र की तीज पर गवर के सात घुड़ले का विसर्जन किया जाता है
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