पुराने दिनों की महक यारों संग
क्या दौर था वो! ना कोई फ़िक्र ना कोई जिम्मेदारी!!
बस दोस्तों के साथ चहलकदमी और पुरे दिन मौज मस्ती।।कितने सच्चे हुआ करते थे वो रिश्ते ना नफा देखा जाता था ना नुकसान बस अपनेपन का एहसास।
उनके संग मुस्कराना और अपने सारे गम भुला देना।।
मुफलिसी का दौर तंग हाथ रहता था पर जैसे भी थे बनावटीपन नहीं था।।आज सबकुछ हैं मेरे पास नहीं हैं तो मेरे पुराने यार जहाँ से मैंने अपने जीवन की शुरुआत की लेकिन कभी नहीं सोचा था कि सफलता उनसे बिछड़ने और भुला देने का पर्याय हैं।।खो दिया उनको कहीं अतीत की गहराईयों में जहाँ से वो कहीं भी दिखाई नहीं देते।।क्या जमाना हुआ करता था वो ना कोई फरेब ना धोखा बस दोस्ती की निर्मलता और सहयोग की महक खुदबखुद होंठो पर मुस्कान तैर जाया करती थी।आज भी वो पुरानी गलियां वो चाय की थड़ी जब भी कभी गुजरता हूँ वहां से तो ऐसे लगता हैं कि वीराने से गुजर रहा हूँ जहाँ कोई नहीं रहता।। वो एक दूजे के लिए जीना वो अल्हड़पन आज कहीं भी नजर नहीं आता।।आज खुद को जिम्मेदारियो की बेड़ियों में इस कदर झकड़ चुके हैं कि जहाँ से मेरे पुराने यार कहीं नहीं दिखते।। बस जिंदगी अगर एक मौका दे तो मेरे यारों के संग एक दिन फिर से बिताना चाहता हूँ उस दौर को।।।
"जब कभी खोलता हूँ पुराने दिनों की पोटली तो यादें इस तरह से बाहर निकल मायूस सी कर देती हैं मुझे।।"
"अकेला सा तन्हा यारों के बिना जीता हूँ मैं।।
वो जहाँ भी हो खुश रहे ये दुआ करता हूँ मैं।।"
राज कुमार सिंह"आजाद"
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