परिचय
जन्म- 20 जनवरी 1965 ।
उपाधि- जिँदा ।
जन्मस्थान- तिलवासनी, पिपाड़ सिटी, जोधपुर, राजस्थान ।
पिता का नाम- श्री राणारामजी मायला ।
शिक्षा- बीए., एम.ए. एवं विधि मेँ उच्च शिक्षा ।
स्वर्गवास- 26 अक्टूबर 1992 साथीन गांव के समीप सङक दुर्घटना मेँ ।
उपलब्धियाँ
किसानपुत्रो के सिरमौर, स्वाभिमानी व दृढ प्रतिज्ञ, कब्बडी खेल मे राष्ट्रीय स्तर पर ध्वजा लहराई, 15 वर्ष छात्रहित मेँ सर्वस्व लुटा दिया तथा मात्र 27 वर्ष के अपने अल्पजीवन मे अपना नाम इतना उज्ज्वल कर गये जिसे वक्त कि तस्वीर कभी धुँधला नहीँ सकती ।
आपकी याद में 7 अक्टूबर 1995 मेँ भगत की कोठी मेँ जिँदा भवन छात्रावास का उदघाटन पहलवान स्व. श्री दारासिँहजी के करकमलोँ से किया गया । यहाँ आज कई किसानपुत्र अध्ययनरत है तथा जिंदाजी के आशीर्वाद स्वरुप कईयों ने तो समाज को गौरवान्वित भी किया है ।
कविता के रूप में जिंदा जी
जिँदाजी को इन पंक्तियोँ के माध्यम से श्रृदांजली देता हूँ-
धन्य हो मारवाङ की वीर भूमि, पूत जन्मते जहाँ शूरवीर है ।
वो चेहरे सदा स्मरण आते, जो परसेवा की जिँदा तस्वीर है ।।
ऐसा ही एक शेर हमारा, जो बाजु मेँ युवा-बल रखता था ।
राम व नारायण सा मुखमँडल था, हुँकार महादेव सी रखता था ।।
अनीति को कभी ना टिकने दिया, छात्रहित मेँ मरने को सदा तत्पर था ।
रसूखोँ की उसने सदा गरदन मरोङी, स्वाभिमान रखता सदा उपर था ।।
किसानपुत्रोँ का हाथ थामकर, उन्हेँ वो जीना सिखलाता था ।
वो भीषण तूफान था इतना, सदा बुराईयोँ से भिङ जाता था ।।
एक साधारण परिवार से निकलकर, हजारोँ युवादिलोँ का सम्राट बना ।
उसका हाथ कँधे पर था तभी तो, युवा किसान वर्ग अतिविराट बना ।।
केवल सेवा मेँ हि नहीँ बल्कि, खेलोँ मेँ भी क्षमता दिखलाई थी ।
अपनी कबड्डी की थापोँ से जाने, कितने विरोधियोँ को धूल चटाई थी ।।
मनहूस था वो दिन हमारे लिए, वे जिस दिन हमसे दूर हूए ।
छलक पङी हजारोँ आँखे, जाने कितने ह्रदय चकनाचूर हुए ।।
तुम्हीँ एकता, तुम्हीँ ताकत, तुम्ही युवाओँ के अपणायण थे ।
'जिँदा' तुम केवल नर नहीँ थे, सच मेँ तुम 'नारायण' थे ।।[1]
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