जम्मू-कश्मीर : बीजेपी और पीडीपी मसला,

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मोदी जी मेरी आवाज सुनो!
क्या कयामत है कि इधर सिर 'मुंडवाया' और उधर 'ओले' गिरने लगे! मैंने कल ही लिखा था कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी- भाजपा सरकार गठित होने से एक नई सियासत की शुरूआत हुई है मगर इस पहल का मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि इस सूबे में पाकिस्तान का 'कलमा' पढऩे वालों की सरकार काबिज हो जाये। पीडीपी के नेता मुफ्ती मुहम्मद सईद ने राज्य के मुख्यमन्त्री पद की शपथ लेते ही पाकिस्तान समेत आतंकवादियों और हुर्रियत नेताओं को शुक्रिया का 'नजराना' पेश कर डाला और कहा कि बड़ी मेहरबानी इन 'इंसानियत और कश्मीरियत' के अहलकारों की कि उन्होंने सूबे में पूरे अमनो-अमान से चुनाव होने दिये। इतने पर ही मुफ्ती साहब ने हद मुकर्रर नहीं की बल्कि अपनी पार्टी के कुछ विधायकों से मांग उठवा दी कि भारतीय संसद पर हमला करने वाले आतंकवादियों के साजिशकार जिस अफजल गुरु को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी वह न्याय प्रणाली की निरंकुशता थी अत: उसके दफनाये गये शव को वापस कश्मीरियों को सौंपा जाये। क्या गजब का मुख्यमन्त्री मिला है उस सूबे को जिसके लोगों ने 1947 में पाकिस्तान निर्माण का पुरजोर विरोध किया था।
मैं सोच रहा था कि मुफ्ती साहब ने बदलते वक्त का मिजाज पढऩा सीख लिया होगा तभी उन्होंने भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाने की पहल की है मगर वह तो फिर से 1989 में लौट जाना चाहते हैं जब वह वी.पी. सिंह की सरकार में देश के गृहमन्त्री थे और उनकी बेटी रुबैया का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था। इसकी एवज में उन्होंने कई आतंकवादियों को छोड़ा था मगर तब से जम्मू-कश्मीर में जो आतंकवाद पाकिस्तान की शह पर खुलेआम शुरू हुआ वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान समर्थक आतंकवादियों ने अपहरण की यह पहली घटना की थी। 1970 के लगभग शुरू में भी श्रीनगर हवाई अड्डे से उन्होंने एक भारतीय विमान का अपहरण करके उसे लाहौर ले जाकर फूंक डाला था मगर इसके अगले ही साल पाकिस्तान को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी और इसी भारत की फौजों ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटने में पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश)की मुक्ति वाहिनी की मदद मानवीय आधार पर की थी और पूरी दुनिया को बंगलादेश को मान्यता देनी पड़ी थी मगर आज हमारे ही देश के एक प्रान्त का मुख्यमन्त्री सरेआम ऐलान कर रहा है कि उसके सूबे में जो चुनाव शान्तिपूर्वक हुए हैं उन्हें कराने में अलगाववादी संगठन हुर्रियत से लेकर दहशतगर्दों और पाकिस्तान का सहयोग रहा है। जिस मुख्यमन्त्री को इस हकीकत का भी इल्म न हो कि भारत के किसी भी हिस्से में चुनाव कराने और इनके पूरी तरह स्वतन्त्र व निष्पक्ष होने के साथ ही मतदाताओं को निर्भय होकर वोट डालने की गारंटी करना चुनाव आयोग का काम है जो एक संवैधानिक संस्था है तथा इस काम के लिए चुनाव आयोग जरूरी सुरक्षा व्यवस्था करने का पूरा हक रखता है, उसके ऐसे बयान का क्या मतलब निकाला जाये? अगर मुफ्ती साहब पाकिस्तान के इतने ही बड़े खैरख्वाह हैं तो उन्होंने यह मांग अभी तक पाकिस्तान से क्यों नहीं की कि वह अपने कब्जे वाले कश्मीर के लोगों को भी चुनावों में शिरकत करने दे क्योंकि उनके हिस्से की सीटें तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में अभी तक खाली पड़ी हुई हैं?
नहीं भूला जाना चाहिए कि 2002 में जब कांग्रेस पार्टी के साथ मिल कर मुफ्ती साहब ने राज्य में सरकार बनाई थी तो उनके निशाने पर भारतीय फौज ही थी। उनके ही शासनकाल में फौज के सिपाहियों को बांध-बांध कर पीटने तक की हरकतें की गई थीं और उन पर मानवीय अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। भारतीय फौजियों का मनोबल तोडऩे के सारे काम किये गये थे मगर दहशतगर्दों और पाकिस्तान से हमदर्दी दिखा कर मुफ्ती साहब ने परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है कि कश्मीर वादी में विधानसभा के चुनावों में उनकी पार्टी को जो जनसमर्थन मिला है उसमें आतंकवादियों का बहुत बड़ा हाथ है। वादी में जिस तरह राष्ट्रवादी शक्तियों के खिलाफ वोटों की धुरबन्दी हुई उसका सबब यही था कि मुफ्ती साहब की पार्टी के ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी जीतने चाहिएं। मुझे भाजपा से भी एक बात कहनी है कि हुर्रियत के नेताओं की वकालत करने वाली पार्टी के साथ सरकार बनाने से पहले इसके नेताओं को यह जरूर सोचना चाहिए था कि पाकिस्तान का जम्मू-कश्मीर से कोई लेना-देना नहीं है। सब कुछ अक्तूबर 1947 में तय हो चुका था मगर यह कैसे संभव है कि जिस सरकार में भाजपा शामिल हो उसी सरकार का मुखिया डंके की चोट पर यह ऐलान करे कि उसका पहला फर्ज पाकिस्तान और दहशतगर्दों को शुक्राना पेश करना है।
मैं भाजपा के नेताओं से पूछना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का क्या तुक है? क्या भाजपा नेताओं में सत्ता की इतनी लालसा बढ़ गई है कि उन्होंने पीडीपी के साथ सरकार बनाते समय अपने पूर्वज प्रमुख संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत को भी याद नहीं किया। क्या भाजपा को सत्ता सुख को दरकिनार करके जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष की भूमिका नहीं निभानी चाहिए थी? क्योंकि भाजपा और पीडीपी कश्मीर के इतिहास और विचारधारा के दो विरोधी ध्रुव हैं। क्या भाजपा-पीडीपी सरकार बनने के बाद कश्मीर में आतंकवाद रुक जाएगा? मुफ्ती साहब ने कश्मीरी आतंकवादियों और पाकिस्तान का धन्यवाद किया है। सचमुच टीवी पर जब यह सरकार जम्मू में शपथ ले रही थी तो ऐसा लग रहा था मानो हिन्दुस्तान की नहीं, पाकिस्तान के किसी प्रदेश की सरकार शपथ ले रही हो। धारा 370 को तो अटल जी ने भी सत्ता मोह में त्यागा था, मोदी जी ने भी वही किया। अब इसके बाद भाजपा की दूसरी मांग 'समान आचार संहिता' (Common Civil Code) यानी पूरे देश में जम्मू-कश्मीर समेत एक ही कानून भारत के नागरिकों पर लागू होगा, बताएं भला अब इसका भविष्य क्या है?
राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ आंखों पर पट्टी बांधे और अपने डंडों को जमीन पर रखकर क्या कर रहा है। जम्मू-कश्मीर में जो सरकार बनी है वह आतंकवादी गुटों के समर्थकों और हुर्रियत के नागों को ही समर्थन देगी। अगर भाजपा और संघ ने इतना ही समर्थन करना था तो फिर हमारी सरकार को जम्मू-कश्मीर से अपनी फौज और सुरक्षा बलों को वापस बुला लेना चाहिए। 1947 से आज तक एक अनुमान के अनुसार कम से कम एक लाख की संख्या में हमारे फौजी जवान और अद्र्ध सैनिक बल तथा कश्मीर पुलिस के जवान आतंकवादियों से कश्मीर की रक्षा करते शहीद हो चुके हैं। कम से कम वापस बुलाने के बाद हमारे जवानों के पाकिस्तानी दरिन्दे सिर तो नहीं काट सकेंगे? और न ही कारगिल के युद्घ के समय ये दरिन्दे हमारे जिंदा जवानों की आंखें नहीं निकाल सकेंगे। मैंने ऊपर जो कुछ लिखा, इसका जवाब भारत सरकार को आने वाले समय में न केवल संसद बल्कि देश की जनता को भी देना होगा। क्या मुफ्ती साहब को यह नहीं मालूम कि अगर पाकिस्तान की इस राज्य में चलती होती तो इसे कब का अब तक दूसरा 'बलूचिस्तान' बना दिया गया होता। मुफ्ती साहब की बेटी और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की यह बात कि उनके पिता शान्तिप्रिय राजनीतिज्ञ हैं, तब तक किसी के गले नहीं उतर सकती जब तक कि वह यह कबूल न करें कि कश्मीर में अमनो-अमान तब तक पूरी तरह कायम नहीं हो सकता जब तक कि पाकिस्तान अपने एजैंटों के जरिये यहां की फिजां बिगाडऩे की कोशिशें बन्द न करे। इसके साथ ही उन्हें कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद के उस बयान को भी जहन में रखना चाहिए कि इस सूबे के कुछ खास सियासतदानों के आतंकवादियों से सम्बन्ध हैं। इसकी कैफियत देने की जरूरत मैं नहीं समझता क्योंकि मुफ्ती साहब ने खुद ही आइना दिखा दिया है। पाकिस्तान से 'दिल' मिला कर हिन्दोस्तान से 'दिल्लगी' करने को जो लोग सियासत समझते हैं वे कश्मीरियों के हमदर्द किस तरह हो सकते हैं क्योंकि पाकिस्तान तो खुद किराये की जमीन पर तामीर हुआ मुल्क है और ऐसा मुल्क है जिसकी बुनियाद में दस लाख से ज्यादा लोगों की लाशें दबाई गई हैं। ऐसे मुल्क की कसम खाना 'मैकदे' में बैठ कर 'खुदा परस्ती' की आवाजें निकालने से ज्यादा और कुछ नहीं है। इसलिए पीडीपी-भाजपा के न्यूनतम सांझा कार्यक्रम का हलफ उठाना कोई मायने नहीं रखता और मैं आज यह भविष्यवाणी करता हूं कि भाजपा-पीडीपी की यह सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं। इनका बहुत जल्द तलाक होने वाला है तथा जो कसमें मुफ्ती साहब इस समय खा रहे हैं, उस पर गालिब का कहना है कि,
''तूने कसम मैकशी की खाई है गालिब
तेरी कसम का कोई एतिबार नहीं है !''
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