आसाम के नरसंहार की असली वजह। जानिए

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?


बोडो उग्रवादियों द्वारा हाल में
आदिवासियों के एक गांव पर हमला कर कई
लोगों का नरसंहार कर दिया। असम में इस
आतंकी हमले में मरने
वालों की संख्या 72 तक पहुंच गई है।
बता दें कि असम, पूर्वोत्तर का ऐसा राज्य है,
जहां आतंकी अक्सर लोगों को मौत के घाट उतारने
की दुस्साहासिक कार्रवाई करते हैं। असम में
इन आतंकी कार्रवाइयों के पीछे
की वजह dangiyawasnews.com रिसर्च डेस्क,
इन्हीं बातों के मद्देनजर
जरूरी जानकारियां दे रहा है।
असम की आबादी में 28
फीसदी बोडो हैं। ये खुद को असम
का मूल निवासी मानते हैं। ये ब्रह्मपुत्र
घाटी के आसपास से पूरे राज्य में फैले हैं।
यह समुदाय ब्रिटिश काल के भी पहले से
इस इलाके में है। बोडो उग्रवादियों के संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक
फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी एस)
का एक धड़ा हिंसा फैला रहा है।
इसलिए चाहते हैं अलग देश/राज्य
लड़ाई अपने प्रभुत्व और क्षेत्र की है।
एनडीएफबी का जो धड़ा सरकार से बात कर
रहा है, वह अलग राज्य चाहता है
ताकि आदिवासियों और मुस्लिमों से बोडो समुदाय के
हितों की रक्षा की जा सके।
वहीं, बोडो उग्रवादी अरुणाचल से सटे
इलाकों को बोडोलैंड घोषित करना चाहते हैं।
उनका दावा है कि अलग हुए बिना बिना बोडो जाति का विकास
नहीं हो सकेगा। इनके संबंध उल्फा से
हैं जो असम का विभाजन कर अलग संप्रभु राष्ट्र
की मांग कर रहा है।
ऐसे जानें कितने हिंसक हैं उग्रवादी :
एनडीएफबी-एस के पास 500 सशस्त्र
उग्रवादी हैं। ये भूटान और अरुणाचल प्रदेश से
सटी सीमा में सक्रिय हैं। ये
उग्रवादी कोकराझार और सोनितपुर जैसे जिलों में
हमले करते हैं। हमले 15
फीसदी आबादी वाले
आदिवासियों पर ज्यादा होते हैं। 2012 में इन्होंने
राज्य में 20
फीसदी आबादी वाले मुस्लिमों पर
भी हमले किए थे।
सरकार क्यों नहीं रोक पाई ताजा हिंसा : केंद्र
के मुताबिक
एनडीएफबी की साजिश के बारे
में खुफिया रिपोर्ट मिल चुकी थी। लेकिन
संथाल आदिवासियों पर हिंसा रोकने के लिए अर्द्धसैनक बल
समय पर सोनितपुर जैसे इलाकों में
नहीं पहुंच सके। आजादी के
बाद से अब तक अंदरूनी इलाकों में केंद्र और राज्य
की सरकारें पक्की सड़कें
नहीं बनवा सकी हैं। ऐसे में
भारी साजो-सामान के साथ
बलों को वहां पहुंचने में देर लगती है।
यह मसला बाकी राज्यों में मौजूद
नक्सली समस्या जैसा है।

17 संगठन, 800 हथियारबंद आतंकी और
उग्रवादी
1. एनडीएफबी : 1986 में बने इस संगठन
नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के दो धड़े हैं। रंजन
डेमरी के नेतृत्व वाला धड़ा केंद्र सरकार के साथ
शांति वार्ता कर रहा है। सोंगबिजित के नेतृत्व वाले धड़े ने
ही बीते मंगलवार राज्य में
हिंसा की। इस संगठन के पास सबसे
ज्यादा उग्रवादी हैं। इनकी मांग असम
से अलग बोडोलैंड बनाने की है।
2. उल्फा : यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट अॉफ असम के
भी कई धड़े सरकार से शांति वार्ता कर रहे
हैं। लेकिन परेश बरूआ के नेतृत्व वाला धड़ा हिंसक
हमले करता है। इनकी मांग
भी अलग देश बनाने की है।
3. कामतापुर लिबरेशन ऑर्गेनाइजेश : बोडोलैंड
की तरह ये भी कामतापुर राज्य
की मांग कर रहे हैं। इसके भूटान में कई
कैम्प थे जिनका 2003 में सफाया हो चुका है।
4. सीपीआई माओवादी : राज्य
के नौ जिले माओवादी हिंसा से
भी प्रभावित हैं। लेकिन बोडो उग्रवादियों से कम
सक्रिय हैं।
5. मुस्लिम लिबरेशन टाइगर्स ऑफ असम : असम में मुस्लिमों के
विरोध में हिंसा होने पर यह गुट
भी हिंसक प्रतिक्रिया देता है। हरकत
उल मुजाहिदीन बांग्लादेश और
कार्बी पीपुल्स लिबरेान टाइगर जैसे 12 अन्य
संगठन भी असम में सक्रिय हैं।

ऐसा है असम की अशांति का इतिहास
1960 : असम से बोडो बहुल इलाकों को अलग कर उदयाचल
राज्य का गठन करने की मांग 1960 से शुरू हुई।
10 साल तब छुट-पुट प्रदर्शन होते रहे। लेकिन
हिंसा नहीं बढ़ी।
1971 : बांग्लादेश के पूर्वी पाकिस्तान से आजाद
होने के बाद कई बांग्लादेशियों ने असम के रास्ते देश में शरण
ली। सरकार
की हमदर्दी होने के कारण
शरणार्थियों के आने का सिलसिला चलता रहा। 1972 में जब
मेघालय का गठन हुआ तो बोडो समुदाय के नेताओं ने उदयाचल
की मांग फिर तेज कर दी।
1979 : प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में ऑल असम
स्टूडेंट्स यूनियन ने छह वर्ष तक असम आंदोलन चलाया।
उनका विरोध बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर था।
इसी वर्ष उल्फा का गठन हुआ।
1985 : महंत का केंद्र से समझौता हुआ। बाद में
महंत ने असम गण परिषद का गठन कर चुनाव लड़ा और राज्य
के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।
1986 : बोडो उग्रवादियों ने असम को भारत से अलग कर बोडोलैंड
राष्ट्र की स्थापना के लिए
बोडो सिक्योरिटी फोर्स बना ली। साथ
ही, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड
(एनडीएफबी) का रंजन
डेमरी के नेतृत्व में गठन हुआ।
1987 : असम से अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर
बोडो उग्रवादियों ने हिंसक अभियान शुरू कर दिया।
नेपाली मूल के लोगों, बंगाली हिंदुओं,
मुस्लिमों और आदिवासियों को निशाना बनाया गया।
1990 : बोडो हिंसा के साथ ही उल्फा ने
असम को आजाद करने की मांग के साथ हिंसा शुरू
की।
1993 : केंद्र के साथ बोडो एकॉर्ड हुआ लेकिन अगले
ही साल उग्रवादियों ने समझौता तोड़ दिया और फिर
कोकराझार और बोनगेगेन में संहार किया। 600
बंगाली मुस्लिमों की मौत हुई।
1996 :
बोडो उग्रवादियों की हिंसा बंगाली मुस्लिमों,
हिंदुओं के अलावा असम के आदिवासियों के खिलाफ
भी शुरू हुई। इस बार भी सबसे
ज्यादा हिंसा का शिकार कोकराझार जिला हुआ। 200 से
ज्यादा लोगों की मौत हुई।
2003 : बोडो उग्रवादियों से एक और समझौता हुआ। लेकिन
हिंसा जारी रही।
इसी वर्ष उल्फा ने अपना आर्मी डे
मनाया और नेशनल हाइवे पर एक बस को निशाना बनाते
हुए धमाका किया।
2012 : इस वर्ष राज्य में बड़ी हिंसा हुई।
जुलाई में बोडो उग्रवादियों के हमले में 92
लोगों की मौत हुई।
2014 : लोकसभा चुनाव के वक्त उग्रवादी हिंसा में
46 लोगों की मौत हुई। दिसंबर में 72
लोगों की जान गई।
Atul Dhinda

Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment