डांगियावास
मेरा गाँव बहुत ही प्यारा है
जितना गाँव प्यारा है, उससे कही ज़्यादा इसकी यादें प्यारी है||
मुझे आज भी याद है नत्थमलजी के दुकान की वो साबु वाली रंग बिरंगी गोलिया
जो हम स्कूल जाते वक़्त 1रुपये मे16 लेकर खाते थे||
मुझे आज भी याद है की गर्मियो मे हम जब्बार ख़ाँ की kulfi खाकर गले को तर किया करते थे||
सोचता हूँ उसी जमाने मे फिर से चला जाउ,जब हम बारिश मे नंगे होकर ऩहाया करते थे||
हस्ती बा के दुकान की वो जो आठ आने मे सोलह नारंगी वाली गोलिया ,जो दोस्तो को खाने के लिए उधार मे देते थे,मुझे आज भी याद है||
वो लूका छीपी,कब्बड़ी,खो-खो,काँच की गोलिया और घोड़ा कब्बड़ी
पता नही कहा गुम हो गयी||
मुझे आज भी याद है
केसरिया कंवर जी के मेले वाला स्कूटर मेरेघर के फर्श पर शान से दौड़ा करता था||
याद है आज भी सुनेना का चक्कर|
मुझे याद है आज भी "अतुल के मामा" की कविता से ही मेरा नाम अतुल रखा गया||
मुझे याद है आज भी मेरा रंग बिरंगा डांगियावास||
मेरा गाँव बहुत ही प्यारा है
जितना गाँव प्यारा है, उससे कही ज़्यादा इसकी यादें प्यारी है||
मुझे आज भी याद है नत्थमलजी के दुकान की वो साबु वाली रंग बिरंगी गोलिया
जो हम स्कूल जाते वक़्त 1रुपये मे16 लेकर खाते थे||
मुझे आज भी याद है की गर्मियो मे हम जब्बार ख़ाँ की kulfi खाकर गले को तर किया करते थे||
सोचता हूँ उसी जमाने मे फिर से चला जाउ,जब हम बारिश मे नंगे होकर ऩहाया करते थे||
हस्ती बा के दुकान की वो जो आठ आने मे सोलह नारंगी वाली गोलिया ,जो दोस्तो को खाने के लिए उधार मे देते थे,मुझे आज भी याद है||
वो लूका छीपी,कब्बड़ी,खो-खो,काँच की गोलिया और घोड़ा कब्बड़ी
पता नही कहा गुम हो गयी||
मुझे आज भी याद है
केसरिया कंवर जी के मेले वाला स्कूटर मेरेघर के फर्श पर शान से दौड़ा करता था||
याद है आज भी सुनेना का चक्कर|
मुझे याद है आज भी "अतुल के मामा" की कविता से ही मेरा नाम अतुल रखा गया||
मुझे याद है आज भी मेरा रंग बिरंगा डांगियावास||

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